डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान पर रणनीति, कॉन्सेप्ट फोटो
Why Trump Strategy Failed Iran: ईरान-अमेरिका के बीच जारी सैन्य टकराव 14वें दिन में पहुंच चुका है और हालात में किसी तरह की नरमी नहीं दिख रही है। लगातार अमेरिकी और इजरायली हमलों ने मध्य पूर्व की राजनीति को अनिश्चित मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई, जिसे अमेरिका और इजरायल अपनी बड़ी जीत मान रहे थे। हालांकि इसके बावजूद ईरान की सत्ता व्यवस्था में कोई बड़ी दरार नहीं दिखी है।
अयातुल्ला के बेटे मोजतबा खामेनेई के नए सुप्रीम लीडर के रूप में उभरने से तख्तापलट की उम्मीदों को झटका लगा है। कई रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष अमेरिका के लिए उतना आसान नहीं है जितना शुरुआत में माना जा रहा था, आइए 5 फैक्टर्स से समझते हैं कि कहां चूक हो सकती है।
अक्सर माना जाता है कि शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने से व्यवस्था ढह जाती है लेकिन इ़़जरायल-ईरान संघर्ष में यह दांव उल्टा पड़ गया। खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया है, जिन्होंने और भी अधिक आक्रामक रुख अपना लिया है। साथ ही, बाहरी हमले ने ईरान के आंतरिक राजनीतिक मतभेदों को खत्म कर जनता और अलग-अलग गुटों को देश की संप्रभुता के नाम पर एक कर दिया है।
ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। उसने महंगे पारंपरिक हथियारों के बजाय सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन और मिसाइलों पर जोर दिया है। इन हथियारों की संख्या अधिक है और इन्हें रोकना हमेशा आसान नहीं होता। गौरतलब है कि युद्ध में F-35 और F-22 जैसे स्टील्थ फाइटर जेट, तथा THAAD और पैट्रियट जैसी महंगी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को सबसे शक्तिशाली हथियार माना जाता था। लेकिन हालिया युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि केवल अत्याधुनिक और महंगे हथियारों के भरोसे ही लड़ाई नहीं जीती जा सकती।
ईरान ने इस युद्ध में शाहेद-136 ‘वन-वे अटैक’ ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है। इन ड्रोन ने साबित किया है कि जब सैकड़ों या हजारों की संख्या में एक साथ हमला किया जाए तो दुनिया के सबसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम भी उन्हें पूरी तरह रोक पाने में संघर्ष कर सकते हैं।
इसके अलावा MQ-9 रीपर ड्रोन भी युद्ध में काफी प्रभावी साबित हुए हैं। यह एक अत्याधुनिक और महंगा ड्रोन है, इसलिए इसकी संख्या सीमित रहती है। बावजूद इसके, कई मौकों पर इसने इजरायल, अमेरिका और उनके सहयोगी देशों को रणनीतिक रूप से दबाव में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ईरान वॉर इन्फोग्राफिक
परमाणु और सैन्य ठिकानों पर शुरुआती हमलों के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों को लगा कि ईरान दबाव में आ जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यहीं सबसे बड़ी रणनीतिक चूक हुई। अमेरिका और इजरायल को लगा कि परमाणु संयंत्रों पर हमले से ईरान की प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो गई है, जबकि उन्होंने हिजबुल्ला और हमास जैसे प्रॉक्सी गुटों की ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ क्षमता को कम आंका। साथ ही ‘आयरन डोम’ और ‘एरो’ जैसी मिसाइल डिफेंस प्रणालियों की सफलता ने तकनीकी श्रेष्ठता का ऐसा अहंकार पैदा कर दिया कि जमीनी इंटेलिजेंस और संभावित पलटवार के जोखिम को नजरअंदाज कर दिया गया।
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ईरान ने इजरायल के लाखों डॉलर के इंटरसेप्टर मिसाइलों को अपने कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों से थकाकर ‘इकोनॉमिक ड्रेन’ की स्थिति पैदा कर दी। वहीं अमेरिका-इजरायल की हाई-टेक सर्विलांस के बावजूद ईरान ने अप्रत्याशित जगहों से हमला कर इंटेलिजेंस के ‘ब्लाइंड स्पॉट’ को उजागर किया और तकनीकी श्रेष्ठता के दावे को चुनौती दी। साथ ही इस कार्रवाई के जरिए ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह सीधे हमला करने की क्षमता और हिम्मत रखता है, जिससे क्षेत्र में अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
अमेरिका अपनी अत्याधुनिक तकनीक के दम पर इस संघर्ष को सीमित और तेज़ कार्रवाई, यानी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसे ऑपरेशनों तक रखना चाहता है ताकि युद्ध जल्दी खत्म हो सके। इसकी बड़ी वजह एक साफ एग्ज़िट स्ट्रैटेजी ढूंढना है, क्योंकि लंबा युद्ध अमेरिका पर आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है, घरेलू राजनीति में विरोध पैदा कर सकता है और चीन-ताइवान व रूस-यूक्रेन जैसे मोर्चों पर उसकी रणनीतिक पकड़ कमजोर कर सकता है।
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वहीं ईरान की रणनीति अलग है। वह सीधे सैन्य मुकाबले की बजाय “वार ऑफ एट्रिशन” और असिमेट्रिक वॉरफेयर अपनाकर छोटे-छोटे मोर्चों के जरिए दुश्मन को उलझाए रखना चाहता है। इसके लिए ईरान हमास, हिजबुल्ला और हूती जैसे प्रॉक्सी नेटवर्क के माध्यम से अलग-अलग क्षेत्रों में तनाव बनाए रखता है।
इतिहास में वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे उदाहरण बताते हैं कि लंबे युद्धों में अमेरिका को अंततः बाहर निकलने का रास्ता खोजना पड़ता है। अगर मौजूदा टकराव लंबा खिंचता है तो कूटनीति और मध्यस्थता की कोशिशें तेज होना तय हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संघर्ष अमेरिका के लिए वाकई ‘उल्टा बांस बरेली’ साबित हो सकता है।