बांग्लादेश ने म्यांमार के रोहिंग्याओं को 'बंगाली' बताने पर लगाई फटकार (सोर्स-सोशल मीडिया)
Rohingya Identity Rights In ICJ: बांग्लादेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के समक्ष म्यांमार के हालिया बयानों पर गहरी आपत्ति जताई है। म्यांमार द्वारा रोहिंग्या समुदाय को अवैध ‘बंगाली’ प्रवासी बताने के प्रयास को ढाका ने ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ बताया है। यह विवाद ICJ में रोहिंग्या पहचान अधिकार की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ साबित हो रहा है। बांग्लादेश का कहना है कि म्यांमार का यह तर्क केवल अपनी हिंसा को छिपाने का एक जरिया है।
म्यांमार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में रोहिंग्या समुदाय को ‘बंगाली’ कहकर उन्हें अवैध प्रवासी के रूप में चित्रित करने की कोशिश की है। बांग्लादेश ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर इन दावों को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे ऐतिहासिक झूठ करार दिया है। ढाका का मानना है कि यह 2017 में हुई जातीय सफाई और अत्याचारों से दुनिया का ध्यान भटकाने की एक सुनियोजित साजिश है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार रोहिंग्या एक विशिष्ट जातीय समूह है जिसकी जड़ें म्यांमार के अराकान क्षेत्र में सदियों पुरानी मानी जाती हैं। 1785 में बर्मन साम्राज्य के उदय से पहले भी इस समुदाय की वहां उपस्थिति और उनके सामाजिक रीति-रिवाज सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किए गए थे। रोहिंग्या नाम वास्तव में अराकान की पुरानी राजधानी म्रो हांग या रोहांग से उत्पन्न हुआ है जो उनकी प्राचीन विरासत को दर्शाता है।
हालांकि रोहिंग्या समुदाय की भाषा में चटगांव की बोली से कुछ समानताएं हैं, लेकिन उनकी संस्कृति और परंपराएं बंगाली समाज से काफी अलग हैं। वे म्यांमार की स्वतंत्रता से पहले वहां की राजनीति और सरकार का एक सक्रिय और अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। म्यांमार ने उन्हें उनकी ऐतिहासिक विरासत से अलग करने के लिए ही अब बाहरी नाम ‘बंगाली’ का सहारा लिया है।
म्यांमार के 1982 के विवादित नागरिकता कानून से पहले रोहिंग्या समुदाय को देश में पूर्ण नागरिक अधिकार और मतदान की स्वतंत्रता प्राप्त थी। 2015 के आम चुनावों तक उन्हें वोट देने का अधिकार था, लेकिन बाद में सुनियोजित तरीके से उन्हें राज्यविहीन बना दिया गया। बांग्लादेश का आरोप है कि म्यांमार ने उन्हें हाशिए पर धकेलने के लिए जातीय-धार्मिक आधार पर कई भेदभावपूर्ण कानून बनाए हैं।
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वर्ष 1978 के द्विपक्षीय समझौते में खुद म्यांमार ने रोहिंग्याओं को ‘बर्मा के वैध निवासी’ के रूप में स्वीकार किया था और उनके अधिकारों का वादा किया था। अब म्यांमार अपनी पिछली अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और 2017-18 के प्रत्यावर्तन समझौतों का खुलेआम उल्लंघन कर उन्हें सुरक्षा देने से बच रहा है। आठ वर्षों से अधिक समय बीतने के बाद भी वहां रोहिंग्याओं की सुरक्षित वापसी का कोई माहौल नहीं बना है।
म्यांमार ने यह भी दावा किया था कि 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान पांच लाख बांग्लादेशी शरणार्थी रखाइन प्रांत में अवैध रूप से घुस आए थे। बांग्लादेश ने इस दावे को भी पूरी तरह से खारिज कर दिया क्योंकि म्यांमार इसके समर्थन में कोई भी पुख्ता दस्तावेज पेश नहीं कर सका। म्यांमार का यह बयान रोहिंग्याओं की पहचान के जन्मजात अधिकार को छीनने का केवल एक असफल राजनीतिक प्रयास है।