शेख हसीना का ‘तख्तापलट’ करने वाले हीरो…बांग्लादेश चुनाव में क्यों बन गए जीरो? इनसाइड स्टोरी उड़ा देगी होश
Bangladesh Chunav 2026: बांग्लादेश चुनाव में आखिर ऐसा क्या हुआ कि हसीना का तख्त पलटने वाले 'क्रांतिकारी' चुनावी मैदान में फिसड्डी साबित हो गए? चलिए इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं...
- Written By: अभिषेक सिंह
बांग्लादेशी क्रांतिकारी स्टूडेंट (सोर्स- सोशल मीडिया)
Why NCP Defeated in Bangladesh: राजनीति शतरंज का वह खेल है जहां एक गलत चाल पूरी बाजी पलट देती है। बांग्लादेश के ताजा चुनाव नतीजों ने इसे एक बार फिर साबित कर दिया है। निर्वासन, मुकदमों और सियासी ठंडेपन का लंबा दौर झेलने वाले तारिक रहमान ने धैर्य से अपनी बिसात बिछाई और रिकॉर्डतोड़ जीत दर्ज की।
दूसरी तरफ मुल्क में शेख हसीना का तख्तापलट कर दुनिया भर में सुर्खियां बटोरने वाले छात्र नेता चुनावी गणित में बुरी तरह गच्चा खा गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कल के ‘क्रांतिकारी’ आज चुनावी मैदान में फिसड्डी साबित हुए? चलिए इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं…
बीएनपी को मिली 212 सीटों पर जीत
300 सीटों वाली संसद के लिए हुए इस चुनावी दंगल में मतदान 299 सीटों पर हुआ था। एक उम्मीदवार की मौत के कारण एक सीट पर चुनाव टाल दिया गया, जबकि अदालत ने चटग्राम-3 और चटग्राम-8 सीटों के नतीजे जारी करने पर रोक लगा रखी है। अब तक जारी नतीजों के मुताबिक, तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 212 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की है।
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77 सीटों पर सिमटी जमात-ए-इस्लामी
दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी गठबंधन 77 सीटों पर सिमट गया। सबसे ज्यादा हैरानी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के प्रदर्शन को लेकर हुई, जिसने शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई की थी। यह पार्टी महज 6 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी, जबकि बाकी 8 सीटें ‘अन्य’ के खाते में गईं।
बागी छात्रों की पार्टी को मिलीं 6 सीटें
बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक थी, इसलिए मुकाबला मुख्य रूप से BNP, जमात और छात्रों की नई पार्टी NCP के बीच था। चुनाव से पहले माना जा रहा था कि NCP कमाल कर दिखाएगी, लेकिन बैलेट बॉक्स खुलते ही सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं। NCP ने 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत सिर्फ छह पर नसीब हुईं।
बांग्लादेश चुनाव विश्लेषण (इन्फोग्राफिक-AI)
आखिर क्यों बुरी तरह हारी एनसीपी?
पार्टी के बड़े चेहरे नाहिद इस्लाम और हसनत अब्दुल्ला अपनी सीटें बचाने में कामयाब जरूर रहे, लेकिन यह सफलता उतनी बड़ी नहीं थी जितनी उम्मीद की जा रही थी। अब हार के कारणों की समीक्षा हो रही है और हर किसी की जुबान पर एक ही वजह है कि जमात-ए-इस्लामी का साथ एनसीपी के लिए भारी पड़ गया।
जमात-ए-इस्लामी की दुर्गति क्यों हुई?
इतिहास गवाह है कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के अस्तित्व के खिलाफ रही है। 1971 के मुक्ति संग्राम में इसने पाकिस्तान का साथ दिया था। इसके मिलिशिया साथी (रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स) ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बुद्धिजीवियों की हत्याएं बड़े पैमाने पर रेप और हिंदू अल्पसंख्यकों का नरसंहार किया था।
तारिक रहमान ने दिखाई समझदारी
इन्हीं अपराधों के चलते शेख मुजीबुर रहमान ने इस पर बैन लगाया था, हालांकि बाद में जियाउर रहमान ने संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाकर उन्हें राजनीति में लौटने का मौका दिया। तारिक रहमान की पार्टी BNP ने भी अतीत में जमात के साथ सरकारें चलाई थीं, लेकिन इस चुनाव में तारिक ने समझदारी दिखाते हुए जमात की ‘बदनाम छवि’ से दूरी बना ली। जिसका उन्हें जबरदस्त फायदा मिला।
जमात के साथ ने किया आत्मघात!
दूसरी ओर छात्र नेताओं की पार्टी NCP को लगा कि उनका जोश तो हाई है, लेकिन संगठन की जड़ें कमजोर हैं। अपनी इस कमजोरी को ढकने के लिए उन्होंने उसी जमात-ए-इस्लामी का सहारा लिया, जिससे BNP ने किनारा कर लिया था। यही फैसला उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ।
जमात से हाथ मिलाते ही पार्टी के भीतर दरारें पड़ गईं और कई नेताओं ने सार्वजनिक असहमति जताते हुए पार्टी छोड़ दी। सबसे बड़ा झटका उन वोटर्स से लगा जो खुद को मध्यमार्गी या प्रगतिशील मानते थे। उन्हें धर्म की कट्टर राजनीति करने वाली जमात का साथ बिल्कुल पसंद नहीं आया। हालांकि, पार्टी संयोजक नाहिद इस्लाम ने इसे विचारधारा नहीं बल्कि चुनावी रणनीति बताकर बचाव किया, लेकिन यह तर्क वोटर्स के गले नहीं उतरा।
NCP को ले डूबी युनुस की करीबी
इसके अलावा मोहम्मद यूनुस के साथ करीबी भी NCP को ले डूबी। यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान बांग्लादेश में सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई थी, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े और महंगाई ने कमर तोड़ दी। चूंकि यूनुस सरकार में NCP से जुड़े कुछ छात्र सलाहकार थे, इसलिए जनता का गुस्सा उन पर भी फूटा।
यह भी पढ़ें: मुहम्मद युनुस बनेंगे राष्ट्रपति…तारिक रहमान सौंपेंगे बड़ी जिम्मेदारी? बांग्लादेश में बढ़ी सियासी उथल-पुथल
यूनुस पर यह आरोप भी लगे कि उन्होंने चुनाव में देरी इसलिए की ताकि NCP को मजबूत होने का वक्त मिल सके। इन्हीं सब वजहों से जहां एक तरफ तारिक रहमान ने धैर्य और सही रणनीति से सत्ता में वापसी की, वहीं छात्र नेता अपनी अपरिपक्वता और गलत गठजोड़ के चलते इतिहास रचने से चूक गए।
