डोनाल्ड ट्रंप , अयातुल्ला अली खामेनेई (सोर्स- सोशल मीडिया)
US Iran Military Action: ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों के हिंसक होने के साथ ही यह सवाल तेज हो गया है कि क्या अमेरिका वहां सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस अटकल को और हवा दी है। ट्रंप ने ईरान के लोगों से “विरोध जारी रखने” की अपील की है और यह भी कहा है कि “मदद रास्ते में है।”
इन संकेतों को कई लोग संभावित अमेरिकी हमले के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत बताती है कि ट्रंप के सामने विकल्प सीमित हैं और ईरान पर तत्काल हमला आसान नहीं है। इसके पीछे एक नहीं छह बड़ी वजह है, जिसके कारण ट्रंप ईराम में वेनेजुएला जैसी सैन्य कार्रवाई नहीं कर सकते हैं।
किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए महीनों की तैयारी जरूरी होती है। वेनेजुएला में हस्तक्षेप की योजनाएं लंबे समय तक चली थीं, लेकिन ईरान के मामले में ऐसी स्पष्ट तैयारी नहीं दिखती। हाल के महीनों में मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटती नजर आई है। विमानवाहक पोतों को क्षेत्र से हटाया गया है, जिससे ईरान के भीतर हवाई या मिसाइल हमले के विकल्प और जटिल हो जाते हैं। ऐसे में अमेरिका को क्षेत्रीय सहयोगियों के हवाई अड्डों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
अमेरिका अगर ईरान पर हमला करता है तो उसे कतर, बहरीन, इराक, यूएई, ओमान या सऊदी अरब में स्थित अपने ठिकानों का इस्तेमाल करना होगा। इसका मतलब यह होगा कि ईरान की जवाबी कार्रवाई का निशाना सिर्फ अमेरिकी बल ही नहीं, बल्कि ये मेजबान देश भी बन सकते हैं। राजनीतिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से यह जोखिम भरा है।
हालिया संघर्षों में ईरान की कुछ सैन्य क्षमताओं को नुकसान जरूर हुआ, लेकिन उसकी मिसाइल ताकत अब भी चिंता का विषय है। पहाड़ी इलाकों में छिपे लॉन्च साइट्स और बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए गंभीर चुनौती पेश करती हैं, खासकर अगर एक साथ बड़े पैमाने पर हमला किया जाए।
ईरान में प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं और सैन्य व नागरिक ढांचे अक्सर आपस में जुड़े हुए हैं। ऐसे माहौल में सटीक हमले करना मुश्किल होता है। अगर अमेरिकी कार्रवाई में आम नागरिक या प्रदर्शनकारी मारे जाते हैं, तो इसका उलटा असर पड़ सकता है विरोध कमजोर होने के बजाय अमेरिका-विरोधी भावना बढ़ सकती है और मौजूदा शासन को मजबूती मिल सकती है।
भले ही ईरान में सरकार अलोकप्रिय हो, लेकिन वह कमजोर नहीं दिखती। सेना और शासन के बीच एकजुटता बनी हुई है और दमनात्मक कार्रवाई जारी है। क्षेत्रीय साझेदार भी मानते हैं कि अभी हालात उस बिंदु पर नहीं पहुंचे हैं जहां बाहरी हस्तक्षेप निर्णायक साबित हो।
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अमेरिका, उसके सहयोगी और खुद ट्रंप किसी लंबे संघर्ष के पक्ष में नहीं हैं। ट्रंप साफ कर चुके हैं कि वे ईरान में ज़मीनी सेना नहीं उतारेंगे। ऐसे में सीमित कार्रवाई के बावजूद बड़े टकराव का खतरा बना रहता है। कुल मिलाकर, तीखे बयानों के बावजूद ईरान पर तत्काल अमेरिकी हमले के रास्ते में कई रणनीतिक, सैन्य और राजनीतिक बाधाएं खड़ी हैं। संकेत भले आक्रामक हों, लेकिन फैसला अब भी आसान नहीं है।