पश्चिम बंगाल का इतिहास, फोटो- सोशल मीडिया
West Bengal Political History: भारत के राजनीतिक मानचित्र पर जब हम विभिन्न राज्यों की ओर देखते हैं, तो अक्सर वहां मुख्यमंत्रियों और सरकारों के बदलने का सिलसिला सामान्य बात लगती है। लेकिन पश्चिम बंगाल इस मामले में पूरे देश के लिए एक रहस्यमयी और अनोखा उदाहरण पेश करता है। साल 1977 से लेकर 2026 तक, यानी पिछले लगभग पांच दशकों में इस राज्य ने केवल तीन मुख्यमंत्री देखे हैं- ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और ममता बनर्जी।
एक आम नागरिक के लिए यह समझना जरूरी है कि जहां अन्य राज्यों में हर पांच साल में चेहरे बदल जाते हैं, वहीं बंगाल में आखिर ऐसा क्या रहा जिसने दशकों तक सत्ता को सिर्फ तीन हाथों तक सीमित रखा। यह स्थिरता राज्य के विकास, संघर्ष और उसकी राजनीतिक पहचान की एक लंबी दास्तान बयां करती है।
साल 1977 से पहले बंगाल राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रपति शासन के दौर से जूझ रहा था। लेकिन 1977 में जब वाम मोर्चा सत्ता में आया, तो ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और अगले 23 सालों तक इस पद पर काबिज रहे। उनके शासन को ग्रामीण बंगाल में ‘स्वर्णकाल’ माना गया क्योंकि उन्होंने ‘ऑपरेशन बर्गा’ जैसे भूमि सुधार लागू कर गरीब किसानों को जमीन का हक दिया और पंचायतों को मजबूत बनाया।
हालांकि, इसी दौर में राज्य से उद्योगों का पलायन भी शुरू हुआ और बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी। ज्योति बसु के नाम एक ऐसा रिकॉर्ड भी दर्ज है जो शायद ही कोई भुला पाए- 1996 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला था, जिसे उनकी पार्टी ने ठुकरा दिया और बसु ने इसे खुद “ऐतिहासिक भूल” करार दिया था।
ज्योति बसु, गौतम देब और प्रणब मुखर्जी
साल 2000 में जब ज्योति बसु ने स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ा, तो कमान बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों में आई। बुद्धदेव ने वामपंथ की पुरानी लकीर से हटकर राज्य में आईटी सेक्टर और औद्योगिक निवेश लाने की पुरजोर कोशिश की। उन्होंने कोलकाता को टेक्नोलॉजी हब बनाने का सपना देखा, लेकिन यही विकास नीति उनकी सरकार के पतन का कारण बन गई।
साल 2006 में टाटा मोटर्स के नैनो प्रोजेक्ट के लिए सिंगूर में हुआ जमीन अधिग्रहण और 2007 में नंदीग्राम का केमिकल हब विवाद बंगाल की राजनीति के टर्निंग पॉइंट साबित हुए। पुलिस कार्रवाई में हुई मौतों और किसानों के भारी विरोध ने 34 साल पुराने वाम शासन की जड़ें हिला दीं, जिससे ममता बनर्जी के उदय का रास्ता साफ हो गया।
2011 में जब ममता बनर्जी ने “परिवर्तन” का नारा दिया, तो उन्होंने न केवल वाम किलों को ढहाया, बल्कि लगातार तीन कार्यकाल जीतकर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। कन्याश्री, सबूज साथी और दुआरे सरकार जैसी स्कीमों ने सीधे तौर पर महिलाओं और ग्रामीण तबके को लाभ पहुंचाया, जिससे उन्हें हर चुनाव में बंपर समर्थन मिला।
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हालांकि, उनका यह सफर विवादों से अछूता नहीं रहा। शारदा चिटफंड घोटाला, शिक्षक भर्ती विवाद और राजनीतिक हिंसा के आरोपों ने विपक्ष को उनके खिलाफ हमलावर होने का मौका दिया। विशेष रूप से 2021 के बाद से भाजपा राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है, जिससे मुकाबला अब त्रिकोणीय से बढ़कर सीधा होता जा रहा है।
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और वाम-कांग्रेस गठबंधन की त्रिमूर्ति खड़ी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बंगाल में केवल तीन मुख्यमंत्रियों का होना वहां की मजबूत विचारधारा और करिश्माई नेतृत्व का नतीजा है। जहां एक तरफ ममता बनर्जी अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इस सालों पुराने तिलस्म को तोड़ने के लिए बेताब हैं।