FIR हुई रद्द…लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने सुना दी हैरतअंगेज सजा! जज का तर्क बना चर्चा का विषय
Delhi High Court: पड़ोसियों के बीच हुए विवाद का मामला जब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, तो जज ने ऐसी सजा सुनाई जिसे जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे। सजा के तौर पर दोनों पक्षों को पिज्जा और छाछ परोसने को कहा गया
- Written By: पूजा सिंह
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Unique Decision Of Delhi High Court: अदालतें अक्सर मामलों की सुनवाई करते हुए सख्त और गंभीर फैसलें सुनाती हैं। लेकिन कभी-कभी न्यायपालिका ऐसे निर्णय भी देती है, जो न सिर्फ विवाद सुलझाते हैं, बल्कि समाज में प्यार और भाईचारा बढ़ाने का संदेश भी देते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का एक ऐसा ही अनोखा मामला सामने आया, जहां अदालत ने दो पक्षों के बीच झगड़ा खत्म करने के लिए सजा या जुर्माने के बजाय पिज्जा और छाछ के जरिए मेल-मिलाप का रास्ता दिखाया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने पड़ोसियों के बीच पालतू जानवर को लेकर हुए विवाद को लेकर अनोखा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दो पड़ोसियों के बीच झगड़ा और एक-दूसरे के विरूद्ध प्राथमिकी को रद्द कर दिया है। साथ ही दोनों पक्षों को कोर्ट ने आदेश दिया है कि दोनों पक्ष सरकारी बाल आश्रम में बच्चों और स्टाफ को पिज्जा और अमूल छाछ पिलाने का निर्देश दिया है।
‘कार्यवाही जारी रखने से कोई लाभ नहीं होगा’
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा ने कहा कि दोनों पक्षों ने सौहार्दपूर्ण ढंग से विवाद सुलझा लिया है, ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। उच्च न्यायालय ने कहा,‘आपराधिक कार्यवाही को रद्द न करने से शत्रुता फिर से भड़केगी, जबकि इसे रद्द करने से पड़ोसियों के बीच सौहार्द और मेल-मिलाप को बढ़ावा मिलेगा।’
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‘पिज्जा खिलाएं और छाछ पिलाएं’
जब उच्च न्यायालय को बताया गया कि एक पक्ष पिज्जा बनाने और बेचने का व्यवसाय करता है और दूसरा भी एक सम्मानित नागरिक है, तो न्यायाधीश ने कहा,‘दोनों शिकायतकर्ताओं को निर्देश दिया जाता है कि वे आपस में हाथ मिलाएं और संयुक्त खर्च से दिलशाद गार्डन में जीटीबी अस्पताल के समीप स्थित संस्कार आश्रम में रह रहे लोगों को ‘मिक्स वेजिटेबल पिज्जा’ खिलाएं तथा अमूल छाछ (टेट्रा पैक) पिलाएं।’ उच्च न्यायालय ने कहा,‘आश्रम में रहने वाले हर बच्चे, परिचारकों और अन्य कर्मचारियों को अमूल छाछ के टेट्रा पैक के साथ एक पिज्जा दिया जाए।’
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पालतू जानवर को लेकर हुआ था विवाद
कोर्ट ने इसे दोनों पक्षों द्वारा की गई सामुदायिक सेवा के रूप में देखने का आदेश दिया गया। दोनों प्राथमिकी एक ही घटना से संबंधित थीं। यह आरोप लगाया गया था कि, पालतू जानवर को लेकर हुए विवाद के बाद बात हाथापाई तक पहुंच गई, जिसमें दोनों पक्षों ने दूसरे पक्ष पर हमला किया, धमकी और दुर्व्यवहार का आरोप भी लगाया। अदालत ने दोनों पक्षों को होने वाली अनावश्यक परेशानी से बचाने और आपसी सद्भावना एवं सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए प्राथमिकी रद्द कर दीं।
