NGT को सौंपी रिपोर्ट में हुआ खुलासा, उत्तराखंड में नहीं है वनाग्नि को रोकने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा
रिपोर्ट के अनुसार राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए पेट्रोलिंग वाहन और आग की आपात स्थितियों के दौरान कार्रवाई के लिए जरूरी वायरलेस और सैटेलाइट फोन जैसे कम्युनिकेशन डिवाइसेज की भी भारी कमी है।
- Written By: रीना पंवार
(फोटो सोर्स एएनआई)
नई दिल्ली : पिछले कुछ सालों से वनाग्नि से बुरी तरह प्रभावित उत्तराखंड राज्य में वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं के लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में सौंपी गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में वनाग्नि की घटनाओं से निपटने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे का पूरी तरह अभाव है। इस कारण यहां वनाग्नि की घटनाओं पर समय रहते काबू पाने में सफलता नहीं मिलती।
ऋषिकेश-देहरादून मार्ग के किनारे बड़कोट वन क्षेत्र में पत्तियों को जलाने के मामले पर NGT को न्यायमित्र द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में प्रभावी वन अग्नि प्रबंधन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का घोर अभाव है।
जरूरी अग्निशमन उपकरणों की भारी कमी
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गौरतलब है कि अप्रैल माह में NGT ने इस मामले में सहयोग के लिए वकील गौरव बंसल को न्याय मित्र नियुक्त किया था। उन्होंने पिछले सप्ताह ही इस संबंध में एनजीटी को यह रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उन बड़ी कमियों का समाधान करना बहुत जरूरी है जो राज्य में वन अग्नि के प्रभावी प्रबंधन के मार्ग में रोड़ा अटका रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘ उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी है। इसमें अग्निशमन उपकरणों जैसे सुरक्षात्मक चश्मे, सुरक्षात्मक गियर, हथियार आदि की भारी कमी है। इसके साथ ही दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए अपर्याप्त पेट्रोलिंग वाहन और आग की आपात स्थितियों के दौरान समन्वय और समय पर कार्रवाई के लिए जरूरी वायरलेस और सैटेलाइट फोन जैसे कम्युनिकेशन डिवाइसेज की भी भारी कमी है।”
ट्रिब्यूनल अधिकारियों को लगाई फटकार
इस बीच, ट्रिब्यूनल ने उत्तर प्रदेश के कछुआ वाइल्ड लाइफ सैन्चुरी में खनन कार्य के लिए मशीनी तरीके से अनुमति देने को लेकर राज्य के तीन जिलाधिकारियों एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव की खिंचाई की है। अधिकरण प्रयागराज, मिर्जापुर और संत रविदास नगर (भदोही) जिलों में गंगा नदी के किनारे 30 किलोमीटर लंबे अभयारण्य में अवैध रेत खनन से संबंधित दो संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहा था।
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ट्रिब्यूनल ने पूर्व में गठित दो ज्वाइंट कमेटी की रिपोर्ट सहित अपने समक्ष पेश साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए 24 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा था कि ये खनन पट्टे अधिसूचित अभयारण्य के अंदर तथा उसके आसपास के निषिद्ध क्षेत्र में थे। अधिकरण ने इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन भी बताया।
(एजेंसी इनपुट के साथ)
