आशुतोष महाराज और जगद्गुरु रामभद्राचार्य, फोटो- सोशल मीडिया
Who is Ashutosh Brahmachari: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ पॉक्सो केस दर्ज कराने वाले आशुतोष महाराज विवादों में हैं। शामली के हिस्ट्रीशीटर से लेकर रामभद्राचार्य के शिष्य बनने तक, जानिए आशुतोष महाराज का पूरा आपराधिक और राजनीतिक इतिहास।
प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट के आदेश पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद अब सबकी निगाहें शिकायतकर्ता आशुतोष महाराज पर टिकी हैं। क्या वे वास्तव में एक धर्मगुरु हैं या अपराध की दुनिया से बचने के लिए उन्होंने संन्यासी का चोला ओढ़ा है? आइए विस्तार से समझते हैं।
प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आशुतोष महाराज का असली नाम अश्विनी पांडेय (आशुतोष पांडेय) है। उनका जन्म शामली के कांधला कस्बे में हुआ था, इनके पिता राजेंद्र पांडेय एक प्राइवेट बस में कंडक्टर थे। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आशुतोष कोई साधारण संन्यासी नहीं, बल्कि शामली के कांधला थाने का हिस्ट्रीशीटर (HS नंबर-76A) है। सूत्रों का दावा है कि गिरफ्तारी से बचने और अपनी पहचान छिपाने के लिए आशुतोष ने न केवल अपना नाम बदला, बल्कि संन्यासी का वेश धारण कर लिया।
आशुतोष महाराज की ‘क्राइम कुंडली’ काफी लंबी और चौंकाने वाली है। शामली पुलिस के रिकॉर्ड और अन्य स्रोतों के अनुसार, उनपर 21 से 27 मुकदमे दर्ज हैं। इन मुकदमों में ये गंभीर धाराएं शामिल हैं:
कहा जाता है कि अपराध की दुनिया से अध्यात्म की ओर आशुतोष महाराज का पहला कदम 2022 में पड़ा, जब उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य से दीक्षा ली। वर्तमान में वे ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट’ के अध्यक्ष हैं और कृष्ण जन्मभूमि बनाम शाही ईदगाह मामले में पक्षकार भी बन गए हैं। उनकी सक्रियता केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है; उनकी तस्वीरें उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और ऊर्जा मंत्री एके शर्मा जैसे बड़े नेताओं के साथ भी वायरल होती रहती हैं। यही कारण है कि वे इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि उनकी ‘क्राइम कुंडली’ के बावजूद उन्होंने देश के एक बड़े धर्मगुरु को कोर्ट में घसीट लिया है।
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रिपोर्ट्स की मानें तो आशुतोष महाराज के शातिर होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वे जेल में थे तब भी उन्होंने जालसाजी नहीं छोड़ी। आरोप है कि उन्होंने जेल के अंदर से ही एक फर्जी पत्र (तत्कालीन मंत्री माता प्रसाद पांडेय के नाम पर) जारी कर जेल अधीक्षक के ट्रांसफर का आदेश निकाल दिया था। इसके अलावा, महज 18 साल की उम्र में उन्होंने एक झूठा हलफनामा देकर लोकसभा चुनाव भी लड़ा था।