International Potato Day: बदल रहा आलू का विज्ञान, दिल खोलकर डाइबिटिक मरीज भी खा सकेंगे ये आलू
Aligarh Potato Belt: आलू अब विज्ञान और शोध की नई प्रयोगशाला बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस पर जानिए CPRI शिमला-देहरादून द्वारा विकसित कुफरी नीलकंठ, कुफरी सूर्या जो UP में धूम मचा रही हैं।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
आलू की नई किस्में, AI फोटो
UP Aligarh Potato Belt News In Hindi: बदलती खानपान की जरूरतों और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच कृषि विज्ञान ने आलू की खेती को एक नई दिशा दी है। आलू अब सिर्फ पेट भरने वाली पारंपरिक फसल नहीं रहा, बल्कि विज्ञान और शोध की नई प्रयोगशाला बन चुका है। वैज्ञानिक अब ऐसी किस्में विकसित कर रहे हैं, जो बेहतर पोषण के साथ-साथ प्रोसेसिंग उद्योग की व्यावसायिक जरूरतों को भी पूरा कर सकें।
इसी कड़ी में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) शिमला और देहरादून द्वारा विकसित की गई ‘कुफरी नीलकंठ’, ‘कुफरी सूर्या’ और ‘चिप्सोना-1’ जैसी उन्नत किस्में उत्तर प्रदेश की आलू बेल्ट में तेजी से अपना दायरा बढ़ा रही हैं। इन नई किस्मों के आने से किसानों की आमदनी और बाजार में आलू की गुणवत्ता दोनों में भारी सुधार देखने को मिल रहा है।
अकेले अलीगढ़ में 2 हजार हेक्टेयर में नई प्रजातियों की बुवाई
आंकड़ों की बात करें तो अकेले अलीगढ़ जिले में ही आलू का कुल रकबा 31.5 हजार हेक्टेयर है, जिसमें से इस बार लगभग दो हजार हेक्टेयर में सिर्फ इन नई किस्मों की पैदावार हुई है। अलीगढ़ के अलावा उत्तर प्रदेश के आगरा, हाथरस, मेरठ, सहारनपुर, कन्नौज, फिरोजाबाद, एटा और मैनपुरी जिले में भी इन आधुनिक किस्मों का रकबा तेजी से बढ़ा है।
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खेतों में इसकी उत्पादकता भी काफी शानदार देखी जा रही है। एक हेक्टेयर में करीब 250 से 300 क्विंटल तक आलू की पैदावार निकल रही है। इसके चलते बाजार में आलू के बीज का भाव भी 2040 रुपये से लेकर 2905 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। यह भाव कंद के आकार पर भी निर्भर करता है और अच्छे दाम मिलने के कारण किसान अब खुद बीज भी तैयार कर रहे हैं।
तीनों प्रमुख किस्मों की अनूठी खासियतें
कुफरी नीलकंठ: इस विशेष किस्म में शर्करा (शुगर) और स्टार्च का स्तर सामान्य आलू की तुलना में अपेक्षाकृत काफी कम होता है। इसमें ‘एंथोसायनिन’ जैसे बेहद जरूरी एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माने जाते हैं। स्वास्थ्य के प्रति सजग उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है।
कुफरी सूर्या: सीपीआरआई के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस किस्म की शारीरिक संरचना सामान्य आलू से बिल्कुल अलग है। इसे बेहतर पोषण और संतुलित शर्करा प्रभाव वाली श्रेणियों में शामिल किया जाता है। खेतों में किसानों को इसकी उपज भी काफी अच्छी मिल रही है। आलू निर्यातक जितेंद्र अवस्थी के अनुसार, इस रबी सीजन में कुफरी सूर्या की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी रही है।
चिप्सोना-1: इस किस्म में शुष्क पदार्थ (ड्राई मैटर) की मात्रा अधिक और शर्करा काफी कम होती है। यही वजह है कि चिप्स और अन्य प्रोसेस्ड उत्पाद बनाने वाली बड़ी-बड़ी फूड कंपनियां इसे पहली प्राथमिकता देती हैं। इससे तैयार होने वाले चिप्स का रंग और गुणवत्ता लंबे समय तक काफी बेहतर बनी रहती है।
मधुमेह रोगियों के लिए वरदान और उद्योग जगत में मांग
राज्य बीज प्रमाणन संस्थान के उप निदेशक आरएल प्रसाद ने बताया कि इन नई किस्मों का ग्लाइसेमिक प्रभाव (जीआई) सामान्य आलू की तुलना में काफी कम होता है। इस वजह से इन्हें मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए एक अपेक्षाकृत बेहतर और सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है। अधिक पौष्टिक, रोग प्रतिरोधी और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल इन नई किस्मों पर वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं।
जिला उद्यान अधिकारी (अलीगढ़) सुनील कुमार का कहना है कि कुफरी नीलकंठ की एनसीआर और दिल्ली के बाजारों में मांग लगातार बढ़ रही है। किसानों में अभी इसके प्रति पूरी तरह जागरूकता आना बाकी है, जिसके बाद उन्हें बाजार में इससे भी बेहतर और प्रीमियम कीमत मिल सकती है।
30 मई को क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, आलू दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी खाद्य फसलों में से एक है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, कुपोषण को मिटाने और गरीबी उन्मूलन में आलू की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करने के लिए हर साल 30 मई को दुनिया भर में ‘अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस’ मनाया जाता है।
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लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) सहित देश की कई बड़ी प्रयोगशालाओं में आलू की इन नई किस्मों पर निरंतर परीक्षण किए जा रहे हैं। इन सभी परीक्षणों में यह साबित हुआ है कि सामान्य आलू की तुलना में नई किस्मों में कम शर्करा और उच्च गुणवत्ता है। यही कारण है कि देश की बड़ी चिप्स और फूड प्रोसेसिंग कंपनियां इन्हें हाथों-हाथ खरीद रही हैं।
