

Varanasi Railway And Rajghat Mosque Dispute: वाराणसी के राजघाट में काशी स्टेशन विस्तार और ऐतिहासिक मस्जिद को हटाने के लिए रेलवे के नोटिस का मामला अब एक बेहद गंभीर और कानूनी मोड़ ले चुका है। कल तक जहां रेलवे प्रशासन अपनी जीत के दावे कर रहा था, वहीं आज अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने रेलवे के इस कथित नोटिस के परखच्चे उड़ाते हुए ऐसी दलीलें और सबूत पेश किए हैं, जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है।
मस्जिद कमेटी ने रेलवे के इस कदम को सिर्फ अवैध ही नहीं बताया, बल्कि इसे शहर की कानून व्यवस्था बिगाड़ने की एक सोची-समझी बदनीयती करार दिया है। कमेटी ने दावा किया है कि जिस रेलवे ने मस्जिद हटाने का अल्टीमेटम दिया है, उसी रेलवे ने पहले कोर्ट में खुद माना था कि यह मस्जिद मुसलमानों की मिल्कियत है। इतना ही नहीं कमेटी ने दस्तावेजों के साथ यह भी साबित कर दिया है कि जब इस देश में रेलवे का नामोनिशान नहीं था, यह मस्जिद तब से काशी की धरती पर खड़ी है।
आइए जानते है आखिर अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने रेलवे के नोटिस में कौन सी बड़ी कमियां पकड़ी हैं और इतिहास के कौन से पन्ने खोलकर रेलवे को बैकफुट पर धकेल दिया है।
वाराणसी के राजघाट की गंज शहीदा मस्जिद को लेकर रेलवे प्रशासन के दावों पर अब अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने पांच बेहद कड़े और अकाट्य कानूनी प्रहार किए हैं। कमेटी का पहला और सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि रेलवे ने मस्जिद की दीवार पर जो नोटिस चस्पा किया है, उस पर न तो रेलवे के किसी अधिकारी के हस्ताक्षर (दस्तखत) हैं और न ही नोटिस जारी करने की कोई तारीख लिखी हुई है। कमेटी ने सवाल उठाया है कि बिना तारीख और बिना दस्तखत के इस भ्रामक कागज़ को कानूनी नोटिस कैसे माना जाए?
मस्जिद कमेटी ने साफ तौर पर आरोप लगाया है कि रेलवे प्रशासन जानबूझकर एक बेहद भ्रामक और गैर-कानूनी नोटिस चिपकाकर वाराणसी नगर की शांति और कानून व्यवस्था को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहा है। कमेटी के इन ठोस और ऐतिहासिक सबूतों के सामने आने के बाद अब गेंद रेलवे और जिला प्रशासन के पाले में है।
1883 के पुराने सरकारी नक्शों और खुद वाराणसी रेलवे के पुराने हलफनामे के सामने आने के बाद कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि रेलवे के लिए इस ऐतिहासिक ढांचे पर बुलडोजर चलाना या इसे हटाना इतना आसान नहीं होगा। बहरहाल, इस खुलासे के बाद पूरे राजघाट इलाके में तनाव और सरगर्मी दोनों बढ़ गई है।
बिना दस्तखत और बिना तारीख के नोटिस के सहारे एक हजार साल पुरानी मस्जिद को अवैध बताने की इस जल्दबाजी ने रेलवे की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विकास अपनी जगह जरूरी है, लेकिन इतिहास, कानून और विभागीय हलफनामों को ताक पर रखकर की जाने वाली कोई भी एकतरफा कार्रवाई काशी के सौहार्द को बिगाड़ सकती है। अब देखना यह होगा कि अंजुमन इंतजामिया कमेटी के इन 5 बड़े कानूनी सवालों पर रेलवे प्रशासन क्या सफाई पेश करता है।