'सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान नहीं, दिल्ली आए', वाराणसी में संत बोले- समझौता हमेशा के लिए रद्द हो

Indus Water Treaty: वाराणसी में संस्कृति संसद में भारत सरकार से पाकिस्तान और पड़ोसी देशों के साथ हुए नदी जल समझौतों की समीक्षा और समाप्त हो रहे समझौतों का नवीनीकरण नहीं करने की मांग की गई।
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कन्वेंशन सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद का समापन(सोर्स- नवभारत लाइव)
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Highlights:

  • सिंधु जल समझौता रद्द करने की मांग

  • सिंधु का पानी दिल्ली लाने का सुझाव

  • बच्चों को मोबाइल के बजाय सनातन संस्कृति से जोड़ने की अपील

Swami Jitendranand Saraswati: वाराणसी में सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद का समापन हो गया। समापन सत्र में गंगा संरक्षण, जल प्रबंधन, भारतीय संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

वक्ताओं ने कहा कि गंगा देश की विरासत और धरोहर है। इसकी रक्षा करना जरूरी है। उन्होंने भारत सरकार से पाकिस्तान और पड़ोसी देशों के साथ हुए नदी जल समझौतों की समीक्षा करने और समाप्त हो रहे समझौतों का नवीनीकरण नहीं करने की मांग की।

तीन दिवसीय संस्कृति संसद में देश के सभी राज्यों से अलग-अलग अखाड़ों और प्रमुख पंथों के धर्माचार्य, संत और बुद्धिजीवी शामिल हुए। आयोजन में 2000 से अधिक संतों ने हिस्सा लिया।

सिंधु नदी का पानी भारत में इस्तेमाल हो

जल समझौते और राष्ट्रहित विषय पर आयोजित सत्र के मुख्य वक्ता गंगा महासभा और अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि संतों की मांग है कि पाकिस्तान और पड़ोसी देशों के साथ नदी जल को लेकर हुए जिन समझौतों की अवधि समाप्त हो रही है, उनका नवीनीकरण नहीं किया जाए। उन्होंने कहा कि सिंधु नदी जल समझौते को स्थगित रखने के बजाय हमेशा के लिए रद्द किया जाना चाहिए, ताकि उसके पानी का इस्तेमाल भारत में हो सके।

उन्होंने कहा कि अगर आज जल संरक्षण को लेकर सजग नहीं हुए तो भविष्य में जल संकट का सामना करना पड़ेगा। आने वाले समय में तीसरा विश्वयुद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पानी के लिए होगा।

काशी विद्यापीठ के कुलपति और संस्कृति संसद के समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण करना है। इसके लिए संस्कृति का ज्ञान जरूरी है और इसकी शुरुआत परिवार से होती है। उन्होंने देश की माताओं से अपील की कि छोटे बच्चों को मनोरंजन के लिए मोबाइल देकर उससे दूर न हो जाएं। मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। बच्चों को मोबाइल के बजाय संस्कार दें और उन्हें सनातन संस्कृति से जोड़ें।

वरिष्ठ वैज्ञानिक (डीआरडीओ) डॉ. अनंत नारायण भट्ट ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से व्यवस्थित और स्थापित करने की जरूरत है। गंगा की अविरल धारा में संस्कृति और विज्ञान दोनों शामिल हैं। उन्होंने कहा कि गंगा, नीम और तुलसी के स्वास्थ्य और चिकित्सकीय महत्व को पूरी दुनिया तक पहुंचाना चाहिए।

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि सामाजिक समरसता भारतीय जीवन का आधार है। वैदिक ऋषियों ने ही पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की बात कही थी। भेदभाव और अस्पृश्यता भारतीय समाज पर कलंक हैं। इन्हें मिटाकर पूरे राष्ट्र को एकजुट करना चाहिए।

सिंधु का पानी दिल्ली लाने की मांग

इस सत्र की अध्यक्षता अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचल देवाचार्यजी महाराज ने की। उन्होंने कहा कि हमारे ऋषि-मुनि भी अपने समय के वैज्ञानिक थे। गंगा जल की महत्ता को आज भी वैज्ञानिक स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि बारिश का पूरा पानी जमीन और तालाबों में सुरक्षित रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। शहरों के विकास में भी ऐसी योजना बनाई जाए, जिससे बारिश का पानी बहकर बर्बाद होने के बजाय इस्तेमाल हो सके।

गंगा महासभा के उपाध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने महामना मदन मोहन मालवीय के गंगाजल समझौते का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विधेयक पास होने के बाद महामना हरिद्वार गए थे। वहां उन्होंने गंगा के पानी को लेकर ब्रिटिश सरकार से समझौता किया था। इसमें गोमुख से गंगासागर तक गंगा का अविरल प्रवाह बनाए रखने की गारंटी दी गई थी। साथ ही हिंदुओं की सहमति के बिना इसमें बदलाव नहीं करने की बात कही गई थी।

उन्होंने कहा कि सिंधु नदी के पानी को नहरों और सुरंगों के माध्यम से सतलज, व्यास, रावी और चिनाब नदियों से जोड़कर दिल्ली में यमुना तक लाया जाना चाहिए, ताकि इस पानी का इस्तेमाल भारत में हो सके। उन्होंने कहा कि सिंधु का पानी पाकिस्तान जाने के बजाय दिल्ली आना चाहिए।

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भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को बचाने पर जोर

प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने विभिन्न ग्रंथों में मानव शरीर में ऊर्जा के जिन स्रोतों का उल्लेख किया है, उन्हें वर्तमान विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की वंश परंपरा और आनुवंशिकी के सूत्र जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार, भारतीय सभ्यता 74 लाख वर्ष से भी अधिक पुरानी है।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासन के दौरान भाषा, लिंग, पंथ और क्षेत्र के आधार पर भारतीयों को बांटने का प्रयास किया गया था, लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक विकास से ऐसे दावों की पुष्टि नहीं होती। उन्होंने भारत को मानवता के विकास का मूल स्थान बताया।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने 'दिमागी नक्सल' विषय पर कहा कि देश में रहकर कुछ लोग भारत विरोधी षड्यंत्र कर रहे हैं। वे भारतीय संस्कृति और धर्म के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह हमला केवल संस्कृति और धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के खिलाफ है। इसके प्रति समाज को सजग रहने की जरूरत है।

काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि कला समाज को लंबे समय तक जोड़कर रखती है। चित्रकला, मूर्तिकला, कविता और साहित्य के माध्यम से धर्म और संस्कृति का संदेश आगे बढ़ता है। यदि समाज अपनी कलाओं की रक्षा नहीं करता तो उसकी संस्कृति कमजोर होती है। उन्होंने कहा कि भारत इसलिए बचा रहा, क्योंकि उसकी कला बची रही।

आईआईटी बीएचयू के प्रो. वी. रामनाथन ने कहा कि जब शिक्षा को संस्कृति से अलग किया जाता है तो समाज अपनी परंपराओं से कटने लगता है और अराजकता बढ़ती है। उन्होंने समाज से अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने की अपील की।

पद्मश्री प्रो. कमलाकर त्रिपाठी ने कहा कि हमारी सृष्टि चार हजार करोड़ वर्ष पुरानी है। भारतीय संस्कृति में ज्ञान हासिल करने के लिए पात्रता और संस्कार जरूरी हैं। संस्कार की शुरुआत परिवार से होती है। भारतीय सनातन परंपरा में शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि मुक्ति का माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा और भारतीय ज्ञान के अभाव में युवा भटक रहे हैं। उन्हें सनातन मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए।

परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं

गंगा महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष एसके मिश्रा ने कहा कि 'वसुधैव कुटुंबकम' केवल उपनिषदों का सूत्र नहीं, बल्कि भारत की जीवनशैली है। भारत ने पारसी समुदाय को अपनाया और तिब्बत से आए लोगों को भी अपनी आस्था और संस्कृति बचाने का अवसर दिया। यह भारतीय परंपरा की उदारता और समावेशी सोच को दिखाता है।

उन्होंने कहा कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकती हैं। युवाओं को आधुनिक तकनीक अपनाने के साथ अपनी जड़ों और संस्कृति से भी जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में अलग-अलग विचारों को संवाद के माध्यम से ज्ञान परंपरा का हिस्सा बनाया जाता रहा है।

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