बेटा कंप्यूटर प्रोग्रामर, बहू वकील..पोते सॉफ्टवेयर इंजीनियर.. फिर भी आश्रम में कट रही 85 साल की जिंदगी

Varanasi Ashram Story: अपना घर आश्रम में रह रहीं 85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या की कहानी बुजुर्गों के अकेलेपन की तस्वीर सामने लाती है। परिवार संपन्न होने के बावजूद वह आश्रम को अपना घर मान चुकी हैं।
85 Year Old Woman Finds a New Family at an Old Age Ashram in Varanasi
85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या(सोर्स- फोटो नवभारत)
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Varanasi Old Age Ashram Story: उम्र के आखिरी पड़ाव पर जब इंसान को सबसे ज्यादा अपने परिवार और अपनों के साथ की जरूरत होती है, तब कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिनकी जिंदगी अपनों के बीच नहीं बल्कि आश्रम की चारदीवारी में गुजर रही है। वाराणसी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में रह रही 85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कल्पना मूल रूप से कलकत्ता की रहने वाली हैं। उनका परिवार आर्थिक रूप से सक्षम है। उनका बेटा कंप्यूटर प्रोग्रामर है, बहू वकील हैं और दोनों पोते बड़ी कंपनियों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम करते हैं। इसके बावजूद जीवन के इस पड़ाव पर कल्पना अपने परिवार के साथ नहीं, बल्कि आश्रम में रह रही हैं।

उम्र और शरीर की कमजोरी ऐसी है कि उनका अधिकांश दिन करीब तीन फीट चौड़ी और छह फीट लंबी चौकी पर गुजरता है। जब अपनों की याद आती है तो वह आश्रम में रहने वाले लोगों और वहां के कर्मचारियों से बातचीत कर अपना मन बहलाती हैं। कल्पना के लिए अब यही आश्रम उनका घर और यहां रहने वाले लोग उनका परिवार बन चुके हैं।

पति सरकारी नौकरी में थे, जीवन के 32 साल मध्यप्रदेश में बिताए

कल्पना भट्टाचार्या ने बातचीत में बताया कि उनके पति सरकारी नौकरी में थे। उन्होंने अपने जीवन के करीब 32 साल मध्यप्रदेश में बिताए। परिवार और गृहस्थी के बीच उन्होंने पूरा जीवन गुजारा, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ परिस्थितियां बदलती चली गईं। अब वह अपने परिवार के बीच रहने के बजाय वाराणसी के अपना घर आश्रम में रह रही हैं।

85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या
85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या(सोर्स- फोटो नवभारत)
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कल्पना कहती हैं कि वह अब अपने परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहतीं। आश्रम में रहने से उन्हें इस बात का संतोष है कि यहां उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होता। यहां रहने वाले लोग और सेवा करने वाले सदस्य उनके साथ परिवार की तरह व्यवहार करते हैं। यही वजह है कि अब उन्होंने आश्रम को ही अपना घर मान लिया है।

3 फीट की चौकी पर गुजरता है दिन

85 वर्ष की उम्र में कल्पना की शारीरिक स्थिति ऐसी है कि उनका ज्यादातर समय एक छोटी सी चौकी पर गुजरता है। करीब तीन फीट चौड़ी और छह फीट लंबी चौकी ही उनका दिन-रात का सहारा है। शरीर साथ नहीं देता, लेकिन बातचीत और आसपास के लोगों का साथ उनके लिए मन का सहारा बना हुआ है।

अपनों की याद आने पर वह आश्रम के लोगों से बातचीत करती हैं। परिवार से दूर होने का दर्द उनके शब्दों में महसूस होता है, लेकिन वह किसी के लिए खुद को बोझ नहीं बनाना चाहतीं।

कल्पना अकेली नहीं, आश्रम में कई ऐसी महिलाएं

सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में कल्पना जैसी कई बुजुर्ग महिलाएं रह रही हैं। इनमें कुछ ऐसी भी हैं जिनके परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हैं। किसी के परिजन सरकारी नौकरी में हैं तो किसी के परिवार में बैंक मैनेजर और दूसरे पेशेवर लोग हैं। बावजूद इसके ये बुजुर्ग महिलाएं अपने परिवार के साथ नहीं, बल्कि आश्रम में जिंदगी के अंतिम पड़ाव को गुजार रही हैं।

आश्रम प्रबंधन के मुताबिक कई बुजुर्गों की पहचान और उनके परिवार का पता लगाने का प्रयास किया गया। कुछ लोगों के घर का पता और परिजनों के मोबाइल नंबर भी मिले। आश्रम की ओर से परिवार से संपर्क कर बुजुर्गों के बारे में जानकारी दी गई, लेकिन कई मामलों में परिजनों ने उन्हें वापस ले जाने से इनकार कर दिया।

85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या
85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या(सोर्स- फोटो नवभारत)
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परिवार के पास लौटने का इंतजार, लेकिन जवाब में मिलते हैं बहाने

आश्रम प्रबंधन का कहना है कि कई बुजुर्गों की इच्छा है कि उनके अपने उन्हें वापस घर ले जाएं। उन्हें अपने बच्चों और परिवार के साथ रहने की उम्मीद रहती है। लेकिन जब आश्रम की ओर से उनके परिवार से संपर्क किया जाता है तो कई परिजन बुजुर्गों को अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं होते।

परिवारों की ओर से अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। किसी के पास समय नहीं है तो कोई देखभाल की जिम्मेदारी लेने में असमर्थता जताता है। ऐसे में जिन माता-पिता ने अपने बच्चों की जिंदगी संवारने में अपना जीवन लगा दिया, उनके जीवन का अंतिम पड़ाव आश्रम में बीत रहा है।

आश्रम में 632 लोग, 275 महिलाएं

अपना घर आश्रम के डॉ. निरंजन के मुताबिक वर्तमान में आश्रम में कुल 632 लोग रह रहे हैं। इनमें 275 महिलाएं हैं। आश्रम में रहने वाले लोगों में करीब 35 प्रतिशत की पहचान हो चुकी है। कई लोगों के घर और परिवार की जानकारी भी जुटाई जा चुकी है।

डॉ. निरंजन के मुताबिक परिवार की पहचान होने के बाद भी सभी बुजुर्गों को उनके घर वापस भेजना आसान नहीं है। कई परिवार उन्हें वापस लेने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में आश्रम ही उनके लिए सहारा बनता है।

मानव सेवा को माना सच्ची सेवा

डॉ. निरंजन बताते हैं कि संस्था मानव सेवा को ही सच्ची सेवा मानकर काम करती है। आश्रम से जुड़े दर्जनों लोग निस्वार्थ भाव से यहां रहने वाले बुजुर्गों और असहाय लोगों की सेवा करते हैं। उनके मुताबिक किसी ऐसे व्यक्ति की सेवा करना, जिसके पास अपना कहने वाला कोई नहीं है, संस्था के सदस्यों के लिए सबसे सुकून देने वाला अनुभव है।

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यहां रहने वाले लोगों की जरूरतों का ध्यान रखने के लिए आश्रम में भोजन से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं तक की व्यवस्था की गई है।

भोजन से इलाज तक, सब कुछ निशुल्क

आश्रम प्रबंधन के अनुसार यहां रहने वाले लोगों को प्रतिदिन निशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है। बीमार लोगों के इलाज की व्यवस्था भी आश्रम में है। गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आईसीयू बेड तक की सुविधा उपलब्ध होने का दावा प्रबंधन की ओर से किया गया है। जरूरत के मुताबिक दवाइयां भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

यानी जिन बुजुर्गों को उनके अपनों ने स्वीकार नहीं किया, उनके लिए अपना घर आश्रम एक ऐसा स्थान बन गया है जहां उन्हें रहने, खाने और इलाज की सुविधाएं निशुल्क मिल रही हैं।

अपनों ने छोड़ा, आश्रम ने अपनाया

कल्पना भट्टाचार्या की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की कहानी नहीं है। यह उन तमाम बुजुर्गों की जिंदगी की तस्वीर है जो उम्र के अंतिम पड़ाव में परिवार का साथ चाहते हैं, लेकिन परिस्थितियां उन्हें आश्रम तक ले आती हैं।

कल्पना के लिए अब अपना घर आश्रम ही परिवार है। वह कहती हैं कि यहां उन्हें परायों से अपनों जैसा प्यार मिलता है। शायद यही वजह है कि परिवार से दूर होने का दर्द होने के बावजूद वह आश्रम में खुद को अकेला महसूस नहीं करतीं।

एक तरफ परिवार की आर्थिक मजबूती और दूसरी तरफ बुजुर्ग मां का आश्रम में जीवन-कल्पना की कहानी आधुनिक समाज के उस सवाल को सामने रखती है कि बुजुर्गों को सिर्फ सुविधाओं की नहीं, बल्कि अपनेपन और साथ की भी जरूरत होती है।

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