Explainer: नीट पेपर लीक से युवाओं में गुस्सा, क्या 2027 के यूपी चुनाव में बिगड़ेगा BJP का खेल? समझिए पूरा गणित
UP Assembly Elections 2027: बीजेपी एमएलसी और पूर्व एबीवीपी नेता संतोष सिंह का दावा है कि 20 जुलाई को दिल्ली में जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान समाजवादी पार्टी के छात्र और युवा संगठनों की मौजूदगी थी।
- Written By: मनोज आर्या
छात्र आंदोलन का यूपी चुनाव पर क्या असर? (AI जेनरेटेड इमेज)
Impact of Student Protests on UP Assembly Elections: नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर के युवा छात्रों में गुस्सा देखा गया। इसका नतीजा यह रहा कि शनिवार, 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पेपर लीक के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन और कानून में सुधार करने का ऐलान किया है। इसके अलावा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) में व्यापक सुधारों के लिए हाई-पावर्ड टास्क फोर्स के गठन की भी घोषणा की गई है।
छात्रों के प्रदर्शन के बीच उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने नीट परीक्षा में सफल हुए छात्रों और उनके अभिभावकों से मुलाकात की। उन्हें भरोस दिलाया कि बीजेपी सरकार छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए कई अहम फैसल रही है।
कार्यकर्ताओं के मनोबल बढ़ाने की कोशिश
इससे पहले बुधवार को पंकज चौधरी ने राजधानी लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस से कांग्रेस कार्यालय तक एक मार्च का नेतृत्व किया। इस दौरान कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के बाहर किए गए धरने का विरोध किया गया। भाजपा के एक अन्य नेता ने कहा कि पार्टी का लखनऊ मार्च सिर्फ कार्यकर्ताओं के मनोबल बढ़ाने के लिए था, जिन्हें पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन और 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस की लाठीचार्ज जैसी घटनाओं के बाद जनता के सवालों का सामना करना पड़ रहा था।
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लखनऊ में मार्च के दौरान यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी, (सोर्स- सोशल मीडिया)
डैमेज कंट्रोल करने में जुटे पंकज चौधरी
भारतीय जनता पार्टी के करीबी सूत्रों के माने तो छात्रों के साथ पंकज चौधरी की मुलाकात कई अहम संकेत के तौर पर देखे जा रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि छात्रों के प्रदर्शन का 2027 के शुरुआत में होने वाले यूपी चुनाव पर असर पड़ सकता है। जिसको लेकर राज्य सरकार और पार्टी के भीतर बेचैनी और आशंकाए तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, पंकज चौधरी ने उस डैमेज कंट्रोल को कम करने की कोशिश की, जो 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा लाठीचार्ज के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे थे।
बीजेपी नेतृत्व में किस बात की चिंता?
यूपी बीजेपी लीडरशिप विशेष रूप से चिंतित है क्योंकि विभिन्न परीक्षाओं, विशेषकर भर्ती परीक्षाओं में परीक्षा परिणाम लीक होने से युवाओं में आक्रोश है। जो यूपी में 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के प्रमुख कारणों में से एक था। इन चुनावों में पार्टी की सीटों की संख्या राज्य की 80 सीटों में से 62 से घटकर 33 रह गई, जबकि उसका वोट शेयर 49.98 प्रतिशत से गिरकर 41.37 प्रतिशत हो गया। उस समय समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीती थीं, जो लोकसभा चुनावों में उसका अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा।
भाजपा के एक पदाधिकारी ने बताया कि गुरुवार को जब वे लखनऊ की एक फार्मेसी में गए, तो वहां मौजूद कुछ लोगों ने पेपर के लीक होने और छात्रों पर लाठीचार्ज को लेकर अपना गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि वे पूछ रहे थे कि सरकार ने युवाओं और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की मांगों पर प्रतिक्रिया देने में इतनी देर क्यों कर दी।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे में देरी पर सवाल
भाजपा के एक और नेता ने कहा कि अगर नीट पेपर लीक के तुरंत बाद मई में ही धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दे देते तो सरकार को युवाओं के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ता। और नहीं विपक्ष को इसे मुद्दा बनाने का मौका मिलता। अब धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन एक सवाल अब भी बना हुआ है कि इसमें इतनी देरी क्यों हुई। बीजेपी के सीनियर नेता लाल कृष्ण आडवाणी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि हवाला केस में सीबीआई द्वारा आरोपित किए जाने के बाद वे 1996 में लोकसभा में अपना इस्तीफा दे दिया था। वहीं साल 1956 में एक ट्रेन हादसे के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिससे नेताओं की जवाबदेही के लिए एक ऐतिहासिक मिसाल कायम हुई थी।
pic.twitter.com/VSArqS98OJ — Dharmendra Pradhan (@dpradhanbjp) July 25, 2026
नीट पेपर लीक मामले में केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कड़े कदमों के बाद भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद है कि एनडीए सरकार के खिलाफ बनी नकारात्मक धारणा जल्द ही बदल जाएगी। हालांकि, पार्टी के भीतर से ही कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने चिंता जताते हुए कहा कि सरकार को ये कदम पहले ही उठा लेने चाहिए थे। उन्होंने सवाल किया कि 20 जुलाई से पहले प्रदर्शनकारियों से मिलकर गतिरोध को दूर क्यों नहीं किया गया, जिससे विरोध को इस स्तर तक बढ़ने का मौका मिल गया।
सरकार के खिलाफ विपक्ष आक्रामक
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा छात्रों के समर्थन में उतरने और धरने में शामिल होने पर बीजेपी का मानना है कि विपक्ष आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, पार्टी नेताओं का दावा है कि विपक्ष की यह रणनीति पूरी तरह नाकाम साबित होगी। सरकार द्वारा उठाए गए नए और सख्त फैसलों से नुकसान की भरपाई होगी और युवाओं के बीच एक सकारात्मक संदेश जाएगा। दूसरी ओर, दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री, बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ लगे विवादित नारों पर पार्टी ने कड़ा रुख अपनाया है। बीजेपी का आरोप है कि छात्रों के इस आंदोलन को बीजेपी विरोधी ताकतों और ‘शहरी नक्सलियों’ ने हाईजैक कर लिया है।
अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवा छात्रों की तस्वीर, (सोर्स- सोशल मीडिया)
बीजेपी एमएलसी और पूर्व एबीवीपी नेता संतोष सिंह का दावा है कि 20 जुलाई को दिल्ली में जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान समाजवादी पार्टी के छात्र और युवा संगठनों की भारी मौजूदगी थी। उनके मुताबिक प्रदर्शन में शामिल लगभग 70 प्रतिशत लोग राजनीतिक दलों से जुड़े थे, न कि वास्तविक छात्र। संतोष सिंह ने आगे कहा कि केंद्र सरकार ने पेपर लीक के बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए दोषियों को गिरफ्तार किया है, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण संसद के मानसून सत्र में सरकार को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पा रहा है।
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किसान आंदोलन के बाद यूपी में सरकार
राजनीतिक असर को लेकर बीजेपी नेता संतोष सिंह ने 2020-21 के किसान आंदोलन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 2022 के यूपी चुनाव से पहले भी किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ था, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद चुनावों पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा और बीजेपी ने दोबारा सरकार बनाई। उसी तरह नीट मामले का भी 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा और पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करेगी। हालांकि, चुनावी आंकड़े बताते हैं कि 2022 के चुनाव में जीत के बावजूद बीजेपी की सीटें 2017 की 309 से घटकर 255 रह गई थीं, जबकि समाजवादी पार्टी 47 से बढ़कर 111 सीटों पर पहुंच गई थी।
