चावल का आटा, बेलपत्र का चूर्ण, काशी विश्वनाथ में आज से मिलेगा नया प्रसादम

दशहरे के अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर में अपना प्रसादम की शुरुआत की गई है। प्रसादम की बिक्री आज यानी 12 अक्टूबर से शुरू हो गई है। ‌ यह प्रसादम अपने आप में विशेष है। विद्वानों की टीम ने अध्ययन के बाद प्रसाद को बनाया है। ‌
काशी विश्वनाथ मंदिर के नए प्रसादम की ब्रिकी शुरु
काशी विश्वनाथ मंदिर के नए प्रसादम की ब्रिकी शुरु
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वाराणसी : भोले बाबा की नगरी काशी विश्वनाथ मंदिर में आज से अपना प्रसादम मिलेगा। ‌ मंदिर प्रबंधन की ओर से इस संबंध में घोषणा की गई है। ‌ इस प्रसादम की खास बात यह होगी कि प्रसादम बनाने में सिर्फ हिंदू कारीगर ही लगाए जाएंगे। ‌ धार्मिक मान्यताओं और नियमों के हिसाब से ही प्रसादम बनेगा। ‌ प्रसादम बनाने से पहले कारीगरों को स्नान करना अनिवार्य रखा गया है।

श्री काशी विश्वनाथ न्यास ने 10 महीने पहले किया था ऐलान

श्री काशी विश्वनाथ न्यास ने 10 महीने पहले अपना प्रसादम बनाने का ऐलान किया था। ‌ इस पर काम शुरू हुआ और विद्वानों की टीम शास्त्र सम्मत प्रसादम बनाने की तैयारी मेंजुट गई। ‌ इसके लिए पुराने का अध्ययन किया गया फिर चावल के आटे से प्रसादम बनाने का फैसला हुआ। चावल के आटे, चीनी और बेलपत्र के चूर्ण से प्रसाद बनाया गया है। ‌ जो बेलपत्र बाबा विश्वनाथ को चढ़ाया जाता है उसी का चूर्ण बनाकर प्रसादम में मिलाया जाएगा। ‌

अमूल कंपनी को मिली है जिम्मेदारी

बाबा विश्वनाथ के प्रसाद को बनाने की जिम्मेदारी अमूल कंपनी को मिली है। कंपनी ने नियमों और शर्ताें के मुताबिक, दस दिन का प्रसादम बना दिया है। प्रसादम को सभी तरह की मान्यताएं मिल चुकी है।

चावव का आटा माना जाता है शुभ

विद्वानों के मुताबिक, धान भारतीय फसल है। इसका जिक्र पुराणों में है। भगवान कृष्ण और सुदामा के संवाद में भी चावल का जिक्र है। भगवान भोले शंकर को चावल के आटे का भोग लगता था। बेल पत्र का महत्व है, इसलिए बाबा विश्वनाथ को चढ़ने वाले बेलपत्र को जुटाया गया, फिर इसे धुलकर साफ कराया गया। सूखने के बाद बेलपत्र का चूर्ण बनाया गया, फिर इसे प्रसादम में मिलाया गया।

प्रसादम को लेकर हो चुका है विवाद

तिरुपति बालाजी मंदिर में प्रसादम को लेकर विवाद हो चुका है। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब तिरुमाला मंदिर ट्रस्ट को गाय के घी की सप्लाई के नमूनों की लैब जांच में लार्ड (सूअर की चर्बी), टैलो (भेड़ की चर्बी) और मछली के तेल की मौजूदगी का पता चला। यह घी तिरुपति के प्रसिद्ध लड्डू प्रसाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद विवाद शुरु हो गया था।

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