

High Court Verdict On Bulldozer Action: उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर दाखिल एक महत्वपूर्ण याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ में मतभेद सामने आया है। दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद अब इस मामले को तीसरे न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया है। मामला हमीरपुर जिले में पॉक्सो और कथित मतांतरण से जुड़े एक प्रकरण में संपत्ति के ध्वस्तीकरण और सीलिंग की कार्रवाई से संबंधित है।
खंडपीठ में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने मामले की सुनवाई की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रशासन द्वारा संपत्ति को सील करने और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की आशंका के बीच संवैधानिक संरक्षण की आवश्यकता है। दोनों न्यायाधीशों की राय अलग होने के कारण अब अंतिम निर्णय तीसरे न्यायाधीश की राय के बाद होगा।
याचिका उस मुकदमे से जुड़ी है, जिसमें आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 67, पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 तथा उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। राज्य सरकार की ओर से अदालत में अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने पक्ष रखा, जबकि याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रियंका मिश्र ने दलील दी कि संबंधित भूमि सिंचाई विभाग की है और वर्ष 2021 में जनहित याचिका पर अतिक्रमण हटाने का आदेश पहले ही पारित किया जा चुका था।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के 'बुलडोजर जजमेंट' का हवाला देते हुए कहा कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के आधार पर उसके मकान को गिराना दंडात्मक कार्रवाई माना जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद कम से कम दो वर्ष तक और तीन वर्ष या उससे अधिक पुराने निर्माणों को हटाने से पहले एक वर्ष पूर्व नोटिस देने जैसे सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए।
वहीं, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इन निष्कर्षों से असहमति जताई। दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग मत के कारण अब यह महत्वपूर्ण मामला तीसरे न्यायाधीश के समक्ष भेज दिया गया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस मामले में आने वाला फैसला बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामलों में भविष्य की न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।