

Dahi Handi Celebration Vrindavan: भादों की नवमी का सूरज जब वृंदावन की पावन धरा पर दस्तक देता है, तो विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर का प्रांगण भक्ति, उल्लास और वात्सल्य के रंग में रंग जाता है। चारों ओर भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों की गूंज सुनाई देती है और वातावरण में बस एक ही स्वर तैरता है—‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।’ यह अवसर होता है नंदोत्सव का, जब वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धा और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में मनाए जाने वाले नंदोत्सव के दौरान बांके बिहारी जी के आंगन में विशेष रूप से ‘दधि-कांधौ’ की परंपरा निभाई जाती है। स्वामी श्री हरिदास जी के लाड़ले बांके बिहारी जी के इस उत्सव में मंदिर के सेवायत नंद बाबा और यशोदा मैया का भाव लेकर भक्तों के साथ कान्हा के जन्म की खुशियां साझा करते हैं।
दधि-कांधौ के दौरान मंदिर परिसर का वातावरण देखते ही बनता है। सेवायत श्रद्धालुओं पर माखन और दही की बौछार करते हैं। जैसे ही माखन-दही की प्रसादी भक्तों के ऊपर बरसती है, पूरा मंदिर परिसर आनंद और उल्लास से झूम उठता है। श्रद्धालु भी इस अनूठे उत्सव में शामिल होकर खुद को धन्य मानते हैं। कोई माखन-दही की इस प्रसादी को अपने हाथों में समेटता है तो कोई इसे अपने मस्तक पर धारण करता दिखाई देता है।
ब्रज की निष्छल भक्ति में माखन और दही की यह प्रसादी महज प्रसाद नहीं मानी जाती, बल्कि भक्त इसे बाल गोपाल का सीधा आशीर्वाद मानते हैं। जब प्रसादी माखन-दही भक्तों के चेहरे और आंखों पर गिरता है, तो वे उसे श्रद्धा के साथ अपने मस्तक और नेत्रों पर धारण कर लेते हैं। इस दौरान भक्तों के चेहरे पर खुशी और भाव-विभोर होने के भाव साफ दिखाई देते हैं।
दधि-कांधौ का यह उत्सव वात्सल्य रस से सराबोर होता है। यहां न कोई छोटा होता है और न कोई बड़ा। हर श्रद्धालु के मन में भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप बस जाता है। ऐसा लगता है मानो वृंदावन की धरती पर एक बार फिर नंद बाबा के आंगन में कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जा रही हों।
उत्सव के दौरान मंदिर परिसर में ‘नंद के आनंद भयो’ और ‘जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष लगातार गूंजते रहते हैं। श्रद्धालु भक्ति में झूमते हैं और बांके बिहारी जी के जयकारों से पूरा वातावरण कृष्णमय हो जाता है।
बांके बिहारी मंदिर में होने वाला यह दधि-कांधौ उत्सव साल में केवल एक बार आने वाला विशेष अवसर है। यही वजह है कि इस आयोजन में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु वृंदावन पहुंचते हैं। भक्तों के लिए माखन-दही की एक-एक बूंद कान्हा के प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक बन जाती है।
नंदोत्सव के इस अलौकिक आयोजन में भक्ति, परंपरा और वात्सल्य का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त कर पाना मुश्किल है। माखन-दही की बौछार में भीगे श्रद्धालुओं के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी इस बात की गवाही देती है कि ब्रज में कान्हा की भक्ति आज भी उसी निष्छल भाव से जीवंत है।
साल में केवल एक बार मिलने वाला यह सुअवसर हर भक्त के हृदय को असीम आनंद से भर देता है और उसे ऐसा अनुभव कराता है, मानो स्वयं लड्डू गोपाल अपने भक्तों के बीच आकर अपनी जन्म की खुशियां बांट रहे हों।