कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन फोटो)
नई दिल्ली: प्रयागराज में इन दिनों महाकुंभ का महा-उत्सव चल रहा है। करोड़ों की संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु संगम नगरी पहुंच रहे हैं। पौष पूर्णिमा के अवसर पर लाखों लोगों ने पवित्र संगम में डुबकी लगाई तो मकर संक्रांति के दिन करीब चार करोड़ लोगों ने स्नान किया। संगम में तीन नदियों का मिलन होता है। इसी के चलते इसे संगम कहा जाता है।
प्रयागराज में गंगा-यमुना और सरस्वती का मिलन होता है। जहां यह समागम होता है उसी स्थान को संगम कहते हैं। संगम में गंगा और यमुना की धाराएं तो दिखती हैं लेकिन सरस्वती अदृश्य हैं। यही वजह है कि लोगों को यह जानने की उत्सुकता होती है कि सरस्वती की धारा कहां विलुप्त हुई और यह कब विलुप्त हुई? चलिए आज इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं।
सरस्वती नदी की खोज के दौरान ड्रिलिंग में मिली जलधारा का परीक्षण अंतिम चरण में पहुंच चुका है। एनजीआरआई हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने कार्बन डेटिंग से जलधारा 12 हजार वर्ष से अधिक पुरानी होने का अनुमान लगाया है। फिलहाल, इस कार्य से जुड़े वैज्ञानिक अधिकृत तौर पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।
महाकुंभ 2025 के पहले अमृत स्नान का एक दृश्य (सोर्स-सोशल मीडिया)
राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) हैदराबाद व डेनमार्क के वैज्ञानिकों ने फरवरी से मार्च 2018 के बीच विलुप्त सरस्वती की खोज संगम (प्रयागराज) शुरू की थी। हेलिकॉप्टर के नीचे लगे हेलिबोन ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम से प्रयागराज, कौशाम्बी, फतेहपुर व कानपुर के बिल्हौर तक जमीन के भीतर सर्वे किया था।
वहीं, केंद्रीय भू जल बोर्ड (सीजीडब्लयूबी) के वैज्ञानिकों की यूनिट ने मार्च 2020 से प्रयागराज के बमरौली, कौशाम्बी के सेंवथा, इछना, म्योहर समेत दो दर्जन स्थानों से आगे फतेहपुर और कानपुर के बिल्हौर व गजनेर तक 100 से 150 मीटर गहराई में बोरवेल ड्रिलिंग की।
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सर्वे के दौरान जमीन के भीतर मिले सेडिमेंट कोर (कीचड़, कंकड़, रेत और पानी) के नमूने कार्बन डेटिंग के लिए एकत्रित किए गए। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सुभाष चंद्रा ने बताया कि ड्रिलिंग में मिले पानी की उम्र का पता लगाने संबंधी शोध अंतिम चरण में पहुंच चुका है।