किशोरी ने दी जान। इमेज-प्रतीकात्मक, एआई
Dalit Teenager Suicide Case In Lakhimpur Kheri : उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जो हमारी कानूनी व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां 14 वर्षीय दलित किशोरी ने आरोपी के खौफ और लगातार मिल रहे मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर मौत को गले लगा लिया। यह मामला न केवल एक मासूम की जान जाने का है, बल्कि यह उस सिस्टम की विफलता भी है, जो पीड़ित को सुरक्षा देने में नाकाम रहा।
मामले की शुरुआत 10 जनवरी को हुई थी, जब किशोरी अपने मवेशियों के लिए चारा लेने खेत गई थी। आरोप है कि वहां 25 वर्षीय लवलेश कुमार ने उसे जबरन झाड़ियों में खींचकर उसके साथ बदसलूकी की। किशोरी के शोर मचाने पर आरोपी ने जातिसूचक गालियां दीं और फरार हो गया। पुलिस ने शिकायत के बाद आरोपी को जेल तो भेजा, लेकिन कुछ ही समय बाद उसे जमानत मिल गई। असली त्रासदी यहीं से शुरू हुई। जमानत पर बाहर आते ही लवलेश ने पीड़ित परिवार को धमकाना शुरू कर दिया। परिजनों के अनुसार उसने किशोरी को रास्ते में रोककर जान से मारने की धमकी दी और मामला वापस लेने का दबाव बनाया।
बुधवार (18 फरवरी) को जब किशोरी के माता-पिता मजदूरी के लिए घर से बाहर थे, तब डरी-सहमी किशोरी ने घर की छत पर फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। पिता का कहना है कि उनकी बेटी लवलेश की धमकियों से इस कदर आतंकित थी कि उसने खाना-पीना तक कम कर दिया था। यह आत्महत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा किया गया एक ‘संस्थागत कत्ल’ जान पड़ता है, जहां अपराधी जमानत का लाभ उठाकर पीड़ित को और अधिक प्रताड़ित करने का साहस जुटा लेते हैं।
इस मामले में पुलिस ने अब आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC 306) और SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर उसे पुनः गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन सवाल यह है कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर पुलिस ने पहले संज्ञान क्यों नहीं लिया? अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में दलित और हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए ‘जमानत’ सजा से अधिक खतरनाक साबित होती है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई आरोपी जमानत पर बाहर आकर गवाहों या पीड़ित को धमकाता है, तो उसकी जमानत तुरंत रद्द होनी चाहिए।
यह भी पढ़ें : ‘महिला का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश, और…’, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित आदेश
इस दुखद घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि केवल FIR दर्ज करना काफी नहीं है। जब तक पीड़ितों के लिए विटनेस प्रोटेक्शन (गवाह संरक्षण) जैसी योजनाओं को धरातल पर मजबूत नहीं किया जाता, तब तक ऐसे अपराधी समाज और न्याय के लिए चुनौती बने रहेंगे।