यूरिया कालाबाजारी मामले में रासुका पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, चार लोगों की तत्काल रिहाई के आदेश

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर में यूरिया कालाबाजारी मामले से जुड़ी चार बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं स्वीकार करते हुए रासुका के तहत निरुद्ध करने के आदेश रद्द कर दिए।
Allahabad High Court Orders Immediate Release of Four Men, Say NSA Should Not Be Misused Urea Black-Marketing Cases
इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Highlights

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किए रासुका के निरुद्ध आदेश

  • बुलंदशहर यूरिया कालाबाजारी केस में चार याचिकाएं स्वीकार

  • कालाबाजारी के मामलों में रासुका लगाने पर हाईकोर्ट की हिदायत

  • कोर्ट ने विशेष कानूनों के दायरे में कार्रवाई पर दिया जोर

Allahabad High Court NSA Verdict: देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था की गम्भीर खतरा पर लगने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम रासुका के उपयोग को लेकर हाईकोर्ट ने विशेष हिदायत दी है। बुलंदशहर में यूरिया की कालाबाजारी पर व्यापारी पर लगे रासुका मामले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते हुए हुए उच्च न्यायालय ने कहा है कि आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी जैसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) का इस्तेमाल कर आरोपियों को लंबे समय तक हिरासत में रखना कानून के उद्देश्य के विपरीत है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण आदेश देते हुए चार याचियों की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मोहम्मद हारून, रामेंद्र सिंह उर्फ गुड्डू, यश राघव और हरेंद्र प्रताप सिंह की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।

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कालाबाजारी के आरोप में हुई थी कार्रवाई

दाखिल याचिका के अनुसार, बुलंदशहर के अनूपशहर में पुलिस ने 10 मई को जांच के दौरान तीन ट्रकों से इफको यूरिया की 525-525 बोरियां जब्त की थीं। आरोप था कि पीसीएफ बफर गोदाम के अधिकारियों की मिलीभगत से यूरिया को कालाबाजारी के लिए खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेचने के उद्देश्य से ले जाया जा रहा था। इस मामले में जिलाधिकारी, बुलंदशहर ने गत 23 मई को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध करने का आदेश जारी किया था।

इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल कर अपनी हिरासत को चुनौती दी। याचियों की ओर से दलील दी गई कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा और कालाबाजारी रोकने के लिए विशेष कानून पहले से मौजूद हैं। ऐसे मामलों में रासुका लगाकर एक वर्ष तक हिरासत में रखना उचित नहीं है।

विशेष कानून के इस्तेमाल पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी के मामलों में संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन हर मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का सहारा लेना उचित नहीं है। अदालत ने रेखांकित किया कि रासुका के तहत किसी व्यक्ति को एक वर्ष तक हिरासत में रखने का प्रावधान है, जबकि संबंधित विशेष अधिनियम में निरुद्ध करने की अधिकतम अवधि छह महीने तक हो सकती है।

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अदालत के अनुसार, सामान्य कानून के तहत कार्रवाई के बजाय अधिक कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल करते समय कानूनी सीमाओं और परिस्थितियों का उचित आकलन जरूरी है। विशेष कानूनों का उद्देश्य विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावी कार्रवाई करना है, न कि सामान्य आपराधिक मामलों में उनका अनावश्यक इस्तेमाल करना।

चारों याचिकाएं स्वीकार, रिहाई का निर्देश

चारों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए निरुद्ध करने के आदेश रद्द कर दिए और सभी याचियों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत के इस फैसले को विशेष कानूनों के इस्तेमाल में कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फैसले से यह संदेश भी सामने आया है कि कालाबाजारी जैसे गंभीर आरोपों में कार्रवाई करते समय भी संबंधित कानून के प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है। केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को कठोर निरोधात्मक कानून के तहत हिरासत में रखना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य और परिस्थितियों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

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