

Highlights:
अखिलेश के बगल में बैठे गोरखपुर के डॉ. संजयन त्रिपाठी
क्या सच में बन गए सपा के ‘संजय’?
2027 में फिर मिलेगा टिकट या कैडर की नाराजगी पड़ेगी भारी?
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे डॉ. संजयन त्रिपाठी
Samajwadi Party Gorakhpur: गोरखपुर की राजनीति में डॉ. संजयन त्रिपाठी की समाजवादी पार्टी में एंट्री का कितना असर होगा, इसका पहला संकेत गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी चुनाव के नतीजों में देखने को मिला है। जिस राजनीतिक समीकरण के तहत अखिलेश यादव ने भाजपा से आए डॉ. संजयन त्रिपाठी को सपा में शामिल कराकर अपना प्रत्याशी बनाया और पहले से घोषित उम्मीदवार का टिकट काटकर उन पर भरोसा जताया था।
उसके पीछे ब्राह्मण वोट बैंक को साधने और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति में 'पंडित' चेहरे को जोड़ने की रणनीति मानी जा रही थी। लेकिन चुनाव परिणाम इस प्रयोग की जमीनी स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करते हैं। भाजपा के ध्रुव कुमार त्रिपाठी 14,887 वोट पाकर चुनाव जीत गए, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव 14,580 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। सपा के आधिकारिक प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी को 9,503 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे।
यानी निर्दलीय प्रत्याशी उनसे 5,077 वोट अधिक हासिल करने में सफल रहे। इससे सवाल उठा कि क्या सपा का ब्राह्मण चेहरा और पीडीए में पंडित को शामिल करने का फॉर्मूला शिक्षक मतदाताओं के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा पाया? हालांकि शिक्षक एमएलसी चुनाव के मतदाताओं का दायरा विधानसभा चुनाव से अलग है, इसलिए इन नतीजों को पूरे गोरखपुर की राजनीति का पैमाना नहीं माना जा सकता।
इसके बावजूद यह परिणाम डॉ. संजयन की सियासी स्वीकार्यता और पार्टी संगठन के साथ उनके तालमेल पर सवाल जरूर छोड़ गया है। दिलचस्प यह है कि चुनावी हार के बावजूद अखिलेश यादव ने उनसे दूरी बनाने के बजाय प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने बगल में जगह दी। ऐसे में अब सवाल सिर्फ उनकी हार का नहीं, बल्कि 2027 में गोरखपुर की राजनीति में उनकी भूमिका और सपा के टिकट पर उनके भविष्य का भी है।
क्या डॉ. संजयन त्रिपाठी अब पूरी तरह समाजवादी पार्टी के हो गए हैं? क्या अखिलेश यादव ने उन्हें अपना राजनीतिक चेहरा स्वीकार कर लिया है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी एक बार फिर उन पर दांव लगाएगी? गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी चुनाव के नतीजों के बाद ये सवाल पूर्वांचल के सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी चुनाव में सपा प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में उनकी हार से ज्यादा चर्चा दूसरे स्थान पर रहे निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव को मिले वोटों की हुई। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठा कि आखिर सपा के आधिकारिक प्रत्याशी होने के बावजूद डॉ. संजयन त्रिपाठी अपने पक्ष में पार्टी के परंपरागत वोटरों को एकजुट क्यों नहीं कर पाए?
चुनाव परिणाम आने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। यह कार्यक्रम शिक्षक एमएलसी चुनाव में जीत दर्ज करने वाले प्रत्याशियों के साथ था, लेकिन इस दौरान डॉ. संजयन त्रिपाठी का अखिलेश यादव के ठीक बगल में बैठना राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया।
सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि डॉ. संजयन त्रिपाठी की राजनीतिक पृष्ठभूमि लंबे समय तक भाजपा और संघ से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रहने की रही है। अचानक सपा में उनकी एंट्री और फिर सीधे एमएलसी चुनाव का टिकट मिलना पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के एक वर्ग के लिए सहज नहीं रहा।
चुनाव के दौरान यह चर्चा भी रही कि संजयन त्रिपाठी के खेमे में नजर आने वाले कुछ लोग निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव के पक्ष में दिखाई देने लगे थे। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनाव परिणाम ने पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी।
डॉ. संजयन त्रिपाठी को सपा में शामिल कराने और टिकट दिलाने में पूर्व विधायक विनय शंकर तिवारी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद मतगणना के दौरान उनका गोरखपुर में नजर नहीं आना राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना। हालांकि इस संबंध में उनकी ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, उनके परिवार के पूर्व विधान परिषद उपसभापति गणेश शंकर पांडेय मतगणना स्थल पर दिखाई दिए।
चुनाव में हार के बावजूद डॉ. संजयन त्रिपाठी ने अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करते हुए साफ कहा कि वह तन, मन और धन से समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में काम करेंगे। उन्होंने 2027 में अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करने का संकल्प भी जताया।
इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस व्यक्ति को दिल्ली हैंडल नहीं कर पाती, उसके निशाने पर डॉ. संजयन त्रिपाठी थे। इसे चुनाव में मिली हार के राजनीतिक संदर्भ से जोड़कर देखा गया।
सोशल मीडिया पर भी डॉ. संजयन त्रिपाठी की सपा में नई राजनीतिक पहचान को लेकर टिप्पणियां हो रही हैं। उन्हें लेकर 'सपा के संजय' जैसी चर्चाएं सामने आ रही हैं।
फिलहाल तस्वीर का एक पहलू साफ है। अखिलेश यादव ने चुनावी हार के बाद भी डॉ. संजयन त्रिपाठी से दूरी नहीं बनाई, बल्कि उन्हें अपने बगल में जगह देकर राजनीतिक भरोसा जताया। लेकिन पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और परंपरागत वोटरों के बीच उनकी स्वीकार्यता कितनी है, यह अब भी बड़ा सवाल है।
गोरखपुर की राजनीति में उनके सपा में आने से कितना बदलाव आएगा, यह अत्यंत दिलचस्प होगा। क्या वह अपने पुराने राजनीतिक और सामाजिक संपर्कों को सपा के साथ जोड़ पाएंगे या फिर पार्टी के स्थानीय संगठन के भीतर ही उन्हें अपनी जगह बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा? शिक्षक एमएलसी चुनाव के नतीजे इस सवाल का अंतिम जवाब नहीं हैं, लेकिन उन्होंने इस राजनीतिक प्रयोग की सीमाओं को लेकर चर्चा जरूर शुरू कर दी है।
क्या अखिलेश यादव 2027 में एक बार फिर डॉ. संजयन त्रिपाठी पर भरोसा जताएंगे या शिक्षक एमएलसी चुनाव का परिणाम उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा बदल देगा? फिलहाल अखिलेश का भरोसा उनके साथ दिख रहा है, लेकिन सपा के कैडर का भरोसा जीतना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
रिपोर्ट:- अनुराग मिश्रा