योगी आदित्यनाथ व अखिलेश यादव (डिजाइन फोटो)
UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है और वह ओबीसी मतदाताओं की अहम भूमिका को पहचान रही है। भाजपा एक नया अभियान शुरू कर रही है जिसका मकसद ओबीसी समुदाय के भीतर लगभग 75 पिछड़ी जातियों में से 30 से ज्यादा जातियों से जुड़ना है और साथ ही वह ज़मीनी सामाजिक स्तर पर संवाद तेज करने की भी तैयारी कर रही है।
खास बात यह है कि 2014 से भाजपा को ओबीसी मतदाताओं का जबरदस्त समर्थन मिला है। एक ऐसा कारक जिसने पार्टी को राज्य विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में सत्ता हासिल करने में मदद की। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने यहां कुछ ऐसा हुआ जिसने भाजपा को टेंशन दे दी।
साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी की ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) रणनीति का उत्तर प्रदेश की राजनीति पर काफी असर पड़ा। इस रणनीति के सीधे नतीजे के तौर पर भाजपा को राज्य में सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। जहां 2019 में पार्टी ने 62 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं, 2024 के चुनावों में उसकी सीटों की संख्या घटकर सिर्फ 33 रह गई।
इस बार भाजपा मुख्य रूप से मौर्य, कुर्मी, कश्यप, कुशवाहा, निषाद, राजभर, सैनी, पाल और प्रजापति जैसी जातियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। जिसका मकसद अपने वोट बैंक का विस्तार करना है। यह रणनीतिक फोकस इस तथ्य पर आधारित है कि इन समुदायों का कई जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में काफी प्रभाव माना जाता है।
इस बीच पार्टी का ओबीसी मोर्चा अलग-अलग ज़िलों में कई कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, जो इन खास जातियों के प्रमुख सामाजिक चेहरों को एक मंच प्रदान करते हैं। इस बारओबीसी वोटों को एकजुट करने के प्रयास की अगुवाई करने के लिए भाजपा ने केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यह ज़िम्मेदारी सौंपी है जो कुर्मी समुदाय के एक प्रमुख चेहरा हैं।
इसके अलावा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के भीतर ओबीसी समुदाय का एक प्रमुख चेहरा बने हुए हैं। हाल ही में भाजपा के पिछड़ा वर्ग मोर्चा का राष्ट्रीय अधिवेशन लखनऊ में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने की। जबकि मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेंद्र कुमार कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन में अहम भूमिका निभाई।
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इस सम्मेलन के जरिए पार्टी ने एक साफ संदेश दिया कि आने वाले चुनावों में पिछड़े वर्ग भाजपा के लिए मुख्य केंद्र बने रहेंगे। फिलहाल केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के कई मंत्री अलग-अलग जिलों का दौरा कर रहे हैं। इन दौरों के दौरान स्थानीय ओबीसी समुदायों के अहम लोगों को जाने-माने सामाजिक और धार्मिक नेताओं से जोड़ा जा रहा है।
नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय और राज्य, दोनों स्तरों पर पिछड़े वर्गों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है और फिलहाल इस समूह के अंदर तीस से ज्यादा ऐसी खास जातियों पर ध्यान दिया जा रहा है। जिसे ‘PDA’ की काट और चुनाव नतीजों पर असर डालने वाला बताया जा रहा है। हालांकि यह असर कितना होगा इसका जवाब तो चुनावी महाभारत के बाद ही पता चलेगा। साथ ही देखना अहम होगा कि अखिलेश यादव बीजेपी के इस दांव का क्या तोड़ निकालते हैं।