जब योगी आदित्यनाथ के लिए डॉक्टर से भिड़ गए उनके गुरु अवैद्यनाथ, किस्सा अद्भुत है!
ये कहानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ही है, लेकिन काफी कम ही लोग हैं, जो ये जानते हैं कि अजय बिष्ट को योगी आदित्यनाथ बनाने के पीछे जिन महंत की भूमिका हैं। उनका नाम अवैद्यनाथ है।
- Written By: अंजू वशिष्ठ
यूपी CM योगी आदित्यनाथ अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ के साथ (सौजन्य- सोशल मीडिया)
नई दिल्ली: ये कहानी 90 के दशक की है। ऋषिकेश में M.Sc. की पढ़ाई कर रहा एक लड़का साल 1993 में कॉलेज छोड़कर सीधा गोरखपुर पहुंच जाता है। वहां गोरखनाथ के पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ से योग सीखने की इच्छा जाहिर करता है। धीरे-धीरे दोनों गुरु-शिष्य का रिश्ता इतना मजबूत हो जाता है कि गुरु उसे अपने पास ही रहने को कहते हैं, पर वो अपनी पढ़ाई पूरी करने ऋषिकेश लौट जाता है। लेकिन कहते हैं एक बार अध्यात्म में मन रम जाए तो फिर सांसारिक दुनिया से अपने आप मोहभंग होने लगता है और यही इस लड़के के साथ हुआ।
22 साल की उम्र में संन्यास ग्रहण कर लिया। एक संन्यासी के तौर पर कान छिदवाना, जमीन पर सोना और तय समय पर खाना ये सब दिनचर्या का हिस्सा हो गया, लेकिन एक दिन ऐसा आया, जब अचानक से इस नौजवान की तबियत खराब हो गई। उस वक्त डॉक्टर चेअकप के लिए पहुंचे तो कहा दूध-दही मत खाना। गुरु ने जैसे ही ये बात सुनी डॉक्टर को कहा, ‘अपनी डॉक्टरी अपने पास रखो, अगर ये दूध-दही नहीं खाएगा तो क्या खाएगा। ऐसे तो बिना खाए हालत खराब हो जाएगी।’ डॉक्टर सलाह देकर लौट गए और अवैद्यनाथ ने साफ कहा कि जितना दूध-दही खाना है खाओ, खाने-पीने से ही तबियत ठीक होगी। आज अवैद्यनाथ नहीं हैं, पर वो किस्सा याद कर आज भी योगी आदित्यनाथ भावुक हो उठते हैं।
योगी के गुरु का असली नाम
ये कहानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ही है। जिन्हें आज देश-दुनिया बुलडोजर बाबा के नाम से जानती है। कोई इनकी शानदार कानून व्यवस्था की मिसाल देता है, तो कोई इसकी आलोचना करता है, लेकिन काफी कम ही लोग हैं, जो ये जानते हैं कि अजय बिष्ट को योगी आदित्यनाथ बनाने के पीछे जिन महंत की भूमिका हैं, उनका नाम अवैद्यनाथ है। बड़ी बात ये है कि जैसे योगी आदित्यनाथ का रियल नाम अजय कुमार बिष्ट है, ठीक वैसे ही इनके गुरु अवैद्यनाथ का नाम भी कुछ और है।
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कौन थे महंत अवैद्यनाथ
28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्मे महंत अवैद्यनाथ के बचपन का नाम कृपाल सिंह बिष्ट था। किस्मत ऐसी थी कि जन्म के कुछ समय बाद ही माता-पिता की मृत्यु हो गई। दादी ने किसी तरह पालन-पोषण किया, लेकिन बड़ा होने से पहले ही दादी भी चल बसीं। एक साथ बचपन में तीन-तीन अपनों को खोने के बाद कृपाल सिंह बिष्ट का मन वैरागी हो गया और फिर इन्होंने अपने हिस्से की सारी संपत्ति दोनों चाचा को बांटकर चारधाम की यात्रा शुरू कर दी।
कहते हैं बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और कैलाश मानसरोवर की यात्रा से जब अवैद्यनाथ लौटे तो तो उन्हें कालरा हो गया, उसी दौरान उनकी मुलाकात महंत निवृत्तिनाथ से हुई, जो नाथ पंथ से जुड़े थे। उन्होंने कृपाल सिंह बिष्ट को गोरखनाथ पीठ के बारे में बताया, और फिर कृपाल सिंह बिष्ट सीधा गोरखनाथ पीठ के महंत दिग्विजयनाथ से मिलने पहुंच गए। पहली ही मुलाकात में महंत दिग्विजयनाथ इनसे इतने प्रभावित हुए कि 2 साल की कड़ी दीक्षा के बाद इन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया। अब कृपाल सिंह बिष्ट महंत अवैद्यनाथ बन चुके थे।
साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब महंत दिग्विजयनाथ को पुलिस ने साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया तो कृपाल सिंह बिष्ट ने ही गोरखनाथ पीठ का कामकाज संभाला, साल 1962 में राजनीति में कदम रखा, लगातार तीन बार गोरखपुर से सांसद रहे, और बाद में अपनी राजनीतिक और धार्मिक विरासत योगी आदित्यनाथ को सौंप दी।
