इलाहबाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
Allahabad High Court: भारत में परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि सास-ससुर की देखभाल करना बहू का नैतिक कर्तव्य है। कई मामलों में पति के निधन के बाद भी विधवा बहू अपने सास-ससुर की सेवा और उनका खर्च उठाती रहती है। हालांकि, अब इस मुद्दे पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। हाईकोर्ट ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि नैतिक जिम्मेदारी चाहें कितनी भी जरूरी और मजबूत क्यों न हो, उसे कानूनी जिम्मेदारी में नहीं बदला जा सकता।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा की बीएनएस की धारा 144 के तहत बहू को सास-ससुर का खर्च उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
दरअसल, यह मामला आगरा का है जहां एक बुजुर्ग दंपत्ति ने अपने बेटे के निधन के बाद बहू से भरण-पोषण की मांग की। बहू द्वारा इनकार करने पर उन्होंने आगरा फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में दंपत्ति ने कहा कि उनकी बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर कार्यरत है और उसकी आय पर्याप्त है। उन्होंने यह भी दलील दी कि बेटे के निधन के बाद उसकी नौकरी से जुड़े लाभ और अन्य सुविधाएं भी बहू को ही प्राप्त हुई हैं। दंपत्ति का कहना था कि वह बुजुर्ग, अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर हैं इसलिए उन्हें बहू से गुजारा भत्ता दिलाया जाए। अगस्त 2025 में फैमली कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था। जिसके बाद दंपत्ति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट में दंपत्ति ने दलील दी कि बहू की नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी जिम्मेदारी के तौर पर माना जाना चाहिए लेकिन अदालत ने इसे नकारते हुए उनकी अपील को खारिज कर दिया। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े मुद्दे इस तरह की भरण-पोषण कार्यवाही में शामिल नहीं होते।
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जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 144 के तहत बहू को सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय कानून के तहत सास-ससुर भरण-पोषण के दायरे में शामिल नहीं होते इसलिए बहू पर उनका खर्च उठाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं बनती। अदालत ने स्पष्ट किया कि विधायिका ने अपनी समझ के अनुसार इस प्रावधान में सास-ससुर को शामिल नहीं किया है, जिससे यह साफ होता है कि कानून बनाते समय बहू पर यह जिम्मेदारी डालने का इरादा नहीं था।