Agra: श्रीजगन्नाथ मंदिर में सतरंगी रंगों से सजी 16 कोट की सांझी, राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबे श्रद्धालु

Radha-Krishna Leela Agra: श्रीजगन्नाथ मंदिर में श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का प्रतीक सांझी उत्सव को आकर्षक रंगों और पुष्पों से सजाया। भक्तों ने श्रीजगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के दर्शन किए।
The 'Sanjhi' depicting the divine pastimes of Radha and Krishna  at the Shri Jagannath Temple in Agra.
श्रीजगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र ( सोर्स-नवभारत लाइव)
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Highlights

  • श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का प्रतीक है 16 कोट की सांझी

  • संध्या देवी के स्वरूप की हुई आरती

  • हरिनाम संकीर्तन से भक्तिमय हुआ मंदिर परिसर

  • राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबे श्रद्धालु

Agra Shri Jagannath Temple: सतरंगी रंगों की छटा, विविध पुष्पों की मनमोहक सजावट और राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबे श्रद्धालु... आगरा के श्रीजगन्नाथ मंदिर में 16 कोट की सांझी ने भक्तिमय वातावरण के बीच ब्रज की प्राचीन धार्मिक परंपरा को साकार कर दिया। श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का प्रतीक मानी जाने वाली इस सांझी को आकर्षक रंगों और पुष्पों से सजाया गया। इसके बाद संध्या देवी के स्वरूप की आरती की गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भाग लिया। मंदिर में भगवान श्रीजगन्नाथ ने बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ विशेष शृंगार में दर्शन दिए। वहीं, ‘हरे रामा, हरे कृष्णा’ के संकीर्तन से पूरा परिसर गूंज उठा।

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राधारानी की भक्ति का प्रतीक है सांझी उत्सव

श्रीजगन्नाथ मंदिर के अध्यक्ष अरविन्द प्रभु ने सांझी उत्सव की धार्मिक मान्यताओं के बारे में बताया कि पितृपक्ष में सांझी उत्सव का आयोजन एक विशेष संयोग है। ब्रज की परंपरा के अनुसार, आश्विन मास की प्रतिपदा से 16 दिनों तक राधारानी ने गोपियों के साथ संध्या देवी की पूजा-अर्चना की थी। यह उपासना श्रीकृष्ण की प्राप्ति और उन्हें प्रसन्न करने की कामना से जुड़ी मानी जाती है। इसी परंपरा का स्मरण आज भी ब्रज क्षेत्र में सांझी उत्सव के रूप में किया जाता है।

उन्होंने बताया कि सांझी के 16 दिनों को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साधना, चिंतन और सेवा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। इन दिनों राधा-कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का स्मरण किया जाता है और उनसे जुड़ी कल्पनाओं को रंगों, पुष्पों, गोबर और पत्तियों जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से कलात्मक स्वरूप दिया जाता है।

सांझी में दिखती है भक्ति की कल्पनाशीलता

सांझी उत्सव में गोपियों के विरह, प्रेम और श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण की भावना को विशेष स्थान दिया जाता है। यह परंपरा बताती है कि भक्ति केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि अपने आराध्य के स्मरण और सेवा से भी जुड़ी है। 16 कोट की सांझी को श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का प्रतीक और राधा-कृष्ण के महामिलन की भावना से जुड़ा स्वरूप माना जाता है।

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अरविन्द प्रभु के अनुसार, सांझी उत्सव के समापन के बाद नवविलास की परंपरा प्रारंभ होती है, जिसमें गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण की विशेष सेवा का भाव व्यक्त किया जाता है। इस प्रकार सांझी ब्रज की उस सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसमें कला, प्रकृति और आध्यात्मिक आस्था एक-दूसरे से जुड़ती हैं।

श्रद्धालुओं ने लिया आयोजन में भाग

श्रीजगन्नाथ मंदिर में आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में नितेश अग्रवाल, सुशील अग्रवाल, शैलेन्द्र अग्रवाल, कान्ता प्रसाद अग्रवाल, राजेश उपाध्याय, संजीव बंसल, शैलेश बंसल, ओमप्रकाश अग्रवाल, संजय कुकरैजा, राजेश मल्होत्रा, संजीव मित्तल, देव केशव, राजेश गंग, सुनील मनचंदा और अदिति गौरांगी सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने सांझी के दर्शन किए और भजन-कीर्तन में सहभागिता की।

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