

महाराजा अग्रसेन को अग्रवाल समाज का संस्थापक माना जाता है।
18 पुत्रों, 18 यज्ञों और गोत्रों की उत्पत्ति लोकपरंपराओं से जुड़ी है।
अग्रोहा धाम महाराजा अग्रसेन की विरासत का प्रमुख केंद्र है।
Maharaja Agrasen 18 Sons: महाराजा अग्रसेन को अग्रवाल समाज काके संस्थापक के साथ-साथ एक आदर्श राजा के रूप में भी याद किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, उनका जन्म द्वापर युग के अंतिम चरण में प्रतापनगर के राजा वल्लभ के घर हुआ था। उन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश का राजा माना जाता है।
कहते हैं, उन्होंने अपनी प्रजा के हित को पहली प्राथमिकता दी और आगे चलकर व्यापार, बराबरी तथा अहिंसा पर आधारित शासन व्यवस्था को बढ़ावा दिया। महाराजा अग्रसेन के जीवन से जुड़ी कहानियां अग्रवाल समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
महाराजा अग्रसेन का शुरुआती जीवन प्रतापनगर में बीता। बाद में उन्होंने अग्रोहा को अपने राज्य का प्रमुख केंद्र बनाया। अग्रोहा को वर्तमान हरियाणा के हिसार क्षेत्र के पास स्थित प्राचीन नगर को माना जाता है।
कहा जाता है कि महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य को एक व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अलग-अलग इकाइयों में बांटा था और यहीं इकाइयां अग्रवाल समाज के शासन और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने और उनके 18 गोत्रों की उत्पति से जुड़ा है। अग्रोहा आज भी अग्रवाल समाज के लिए ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व रखता है।
अग्रवाल समाज में 18 गोत्रों की उत्पत्ति को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों से जुड़ी है। महाराजा अग्रसेन ने अपने 18 पुत्रों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपीं और उन्हीं के वंश से विभिन्न गोत्रों की परंपरा शुरु हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार, महाराजा अग्रसेन ने 18 यज्ञ आयोजित किए। इन यज्ञों में अलग-अलग ऋषियों की भूमिका थी और उन्हीं ऋषियों के नाम पर गोत्र विकसित हुए।
अग्रवाल समाज में गोत्रों की सूची में गर्ग, गोयल, बंसल, कंसल, सिंघल, मंगल, जिंदल, मित्तल, तायल, बिंदल और अन्य गोत्र शामिल हैं।
महाराजा अग्रसेन से जुड़ी कथाओं में 18वें यज्ञ का प्रसंग मिलता है। यज्ञ में पशुबलि की तैयारी देखकर राजा के मन में करुणा जागी। उन्होंने पशु की पीड़ा को महसूस किया और बलि की परंपरा को रोकने का निर्णय लिया। इसी कारण 18वां यज्ञ अधूरा रह गया और अग्रवाल समाज में साढ़े सत्रह गोत्रों की मान्यता प्रचलित हुई।
अग्रवाल समाज में प्रचलित कथा के अनुसार, अग्रोहा में नए बसने वाले परिवारों की सहायता के लिए प्रत्येक परिवार से एक ईंट और एक रुपया दिया जाता है। इस व्यवस्था को सामूहिक सहयोग और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आज अग्रोहा धाम महाराजा अग्रसेन की स्मृति और अग्रवाल समाज की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा प्रमुख तीर्थस्थल है।