गांव तुरतुक। इमेज-एआई
Which is the last village of India to Pakistan : भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमाएं अक्सर तनाव और युद्ध की कहानियां सुनाती हैं, लेकिन लद्दाख के लेह जिले में बसा तुरतुक गांव एक अलग ही दास्तां बयां करता है। यह महज एक गांव नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज एक ऐसा नाम है, जो 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान से अलग होकर भारत का अभिन्न हिस्सा बन गया। आज यह अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और अनूठी बाल्टी संस्कृति के कारण पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना है।
1947 के बंटवारे के बाद तुरतुक पाकिस्तान (बाल्टिस्तान) के पास था। 1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य साहस दिखाते हुए इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इस भौगोलिक बदलाव ने कई परिवारों को दो हिस्सों में बांट दिया-आधे भारत में रह गए और आधे पाकिस्तान में। आज भी यहाँ के लोग वीजा लेकर सरहद पार अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। वैसे, यह कागजी प्रक्रिया खासी जटिल और महंगी है।
बॉर्डर से महज 8 किलोमीटर पहले बसे इस गांव की आबादी 2500 है। यहां आज भी बाल्टी भाषा बोली जाती है। यह गांव अपनी रसीली खुबानी के लिए मशहूर है। इतिहास प्रेमियों के लिए यहां 16वीं सदी की मस्जिद, आइकॉनिक पोलो ग्राउंड, बाल्टी हेरिटेज होम और तुरतुक गोम्पा जैसे आकर्षण मौजूद हैं। यहां से आगे थांग नामक जगह है, जो सीधे पाकिस्तानी सेना की स्नाइपर रेंज में आती है, जो सरहद की संवेदनशीलता का अहसास कराती है।
तुरतुक में इजरायली पर्यटकों की काफी चहल-पहल रहती है। यहां रहने के लिए 800 रुपए से 1000 रुपए में अच्छे गेस्ट हाउस मिल जाते हैं। मगर, असली अनुभव होम स्टे में मिलता है। केवल 350 रुपए प्रति व्यक्ति की शुरुआत में मिलने वाले इन होम स्टे में आप न केवल स्थानीय बाल्टी व्यंजनों का स्वाद चख सकते हैं, बल्कि यहां के लोगों की गर्मजोशी और संस्कृति को महसूस कर सकते हैं।
यह भी पढ़ें : बेहद कम खर्चे में थाईलैंड जैसा आइलैंड देख सकेंगे, बिहार में छिपा है हसीन टूरिस्ट डेस्टिनेशन
तुरतुक जाने के लिए आपको लेह प्रशासन से इनर लाइन परमिट लेना होगा, जो 5 दिनों के लिए वैध होता है। आप इसे सीधे प्रशासनिक कार्यालय या किसी प्रमाणित ट्रैवल एजेंसी से बनवा सकते हैं। ध्यान रहे कि परमिट कार्यालय शाम 5 बजे बंद हो जाता है, इसलिए अपनी योजना समय पर बना लें।