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खेती में क्रांति लाएगा ‘दि ग्रीन इकोनॉमी’, गैर पारंपरिक खेती से बढ़ेगी किसानों की कमाई
साल 2019 में अस्तित्व में आई दि ग्रीन इकोनॉमी कंपनी कम लागत, प्रति एकड़ ज्यादा उत्पादन और भरपूर आमदनी से क्षेत्र के किसानों को समृद्ध करने का काम कर रही है। कंपनी ने कम समय में ही 800 से ज्यादा किसानों का दिल जीता है।
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय

दि ग्रीन इकोनॉमी, फोटो - नवभारत
नागपुर, व्यापार प्रतिनिधि | कम लागत, प्रति एकड़ ज्यादा उत्पादन और भरपूर आमदनी से क्षेत्र के किसानों को समृद्ध करने के उद्देश्य से दि ग्रीन इकोनॉमी कंपनी वर्ष 2019 में अस्तित्व में आई। कंपनी ने अल्प अवधि में ही 800 से ज्यादा किसानों का विश्वास जीता है और प्रगति पथ पर अग्रसर है। इस समय कंपनी वियतनाम के बौने नारियल, केसर आम और खजूर की खेती कर रही है और पिछले 3 वर्षों से कुछ किसानों को आवक आनी भी शुरू हो चुकी है।
कंपनी की निर्देशक निकिता जगदले जो की पेशे से एक फैशन डिजाइनर हैं, ने वाइब्रेट विदर्भ के तहत विशेष बातचीत में बताया कि यह संकल्पना उन्हें रवि देशमुख ने बताई। देशमुख हॉर्टिकल्चर में एम.एससी. हैं और उन्होंने भारत भ्रमण कर प्रत्येक राज्य का दौरा किया था। विदर्भ के किसानों के हिस्से में सिर्फ आत्महत्या ही क्यों? यह उनके सामने ज्वलंत सवाल था। किसानों की सेवा और उन्नति के लिए दोनों ने मिलकर प्रयास शुरू किया और अपारंपरिक फलों की खेती के लिए किसानों को मार्गदर्शन, बगीचे को विकसित करना और मार्केटिंग का भी जिम्मा उठाने लगे।
500 एकड़ में नारियल के पेड़
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नारियल की खेती
अब तक लगबग 500 एकड़ मे वियतनाम हायब्रीड बौना नारियल ग्रीन द्वारफ पौधों का प्लांटेशन कंपनी द्वारा हो चुका है। ये पानी वाला हायब्रीड कोकोनट है। इस में पानी कि मात्रा लगबग 500 ML तक होती है और इसकी टेस्ट मधुर होती है। इसकी खेती एक स्मार्ट इन्व्हेस्टमेंट है, जो किसानों को आनेवाले 40 से 50 सालों तक 8 से 10 लाख रुपये प्रति एकड़ आमदनी देने की क्षमता रखती है। ये फसल किसान भाईयों के लिए बहोत फायदेमंद साबित हो रही है। इसमें खास बात यह है कि असमय बारिश, ओलावृष्टि तथा जंगली जानवरों से कोई खतरा नहीं है. व्यावसायिक भाषा में कहें तो यह बिना रखरखाव की मनी बैक स्कीम है। इसकी खेती विकसित करने 1 एकड़ का खर्च 2.5 लाख तक आता है.इस योजना अंतर्गत गवर्नमेंट कि सब्सिडी उपलब्ध है। – निकिता जगदले, निर्देशक
खजूर की खेती में एक बार निवेश से जीवनभर कमाई है
खजूर की खेती
निकिता जगदले ने बताया कि रेगिस्तान में पाए जाने वाला यह फल विदर्भ के गर्म मौसम में अनुकूल है। इसे पानी भी नहीं के बराबर लगता है। एक पेड़ की उमर 80 से 90 वर्ष की होती है। इसमें एक बार का निवेश जीवनभर की कमाई का जरिया है। अरब देशों से उन्नत किस्म के मेडजूल और बरही किस्मों के टिश्यू कल्चर से विकसित पौधों से इसे विकसित किया जाता है। बदलते मौसम, चोरों और जंगली जानवरों से इसे भी खतरा नहीं है। एक एकड़ में इसकी लागत के लिए 6 लाख तक खर्च आता है।
इस समय विदर्भ में 50 एकड़ में इसे लगाया जा चुका है। नागपुर, अमरावती, यवतमाल, नांदेड़, परभणी और जलगांव में यह बगीचे विकसित किए गए हैं। खजूर भी 4 साल में फल देना शुरू करता है। एक एकड़ में 90 स्त्री और 10 पुरुष जाति के पौधे सहित कुल 100 पौधे लगाए जाते हैं। इसका भी पहले साल में 1,200 किलो का उत्पादन हुआ और 200 रुपये प्रति किलो तक फ्रेश फ्रूट को भाव मिला है। केसर आम, अंजीर,कटहल इ. की भी 1,000 एकड़ में खेती हो रही है। अभी एवोकैडो की भी खेती शुरू की है। कंपनी पौधों को विकसित करने से मार्केटिंग और रीप्लेसमेंट तक की सारी जिम्मेदारी लेती है। इतना ही नहीं सरकारी योजनाओं एनएचबी के जरिए किसानों को लाभ दिलवाने में मदद करती है।
The green economy bring revolution in farming farmers income increase from non traditional farming
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