नेतागिरी की क्या परिभाषा है (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, हमारी इच्छा नेता बनने की है। इसके लिए कुर्ता, चूड़ीदार पैजामा और मोदी जैकेट का इंतजाम हमने कर लिया। पर्सनालिटी डेवलपमेंट और पब्लिक स्पीकिंग की क्लास भी लगा ली है।’ हमने कहा, ‘इस खटपट में क्यों पड़ते हैं? आपके पीछे परिवार की जिम्मेदारी है। नेतागिरी करने जाएंगे तो घर के रहेंगे न घाट के! कोई एकदम से नेता नहीं बनता। पहले जमीन से जुड़े सच्चे कार्यकर्ता बनकर पसीना बहाइए। एक दर्जन लोगों का ग्रुप बनाकर किसी नेता के अगल-बगल घूमिए। अपनी सोशल एक्टिविटी की खबरें अखबार में छपवाइए। इस तरह एक-एक सीढ़ी चढि़ए।
मोर्चे में शामिल होकर नारे लगाने, पोस्टर चिपकाने, धरना देने की अप्रेंटिसशिप करते रहिए। मंच पर दरी बिछाने, कुर्सी लगाने, सजावट करने की साधना करते रहित। उम्मीद रखिए कि कभी आपके मुंह में अंगूर आ टपकेगा।’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, ऐसा करते-करते 10-20 साल व्यर्थ ही गुजर जाएंगे। हमें नेतागिरी का शॉर्टकट बताइए। ऐसा रास्ता बताइए कि हींग लगे ना फिटकरी लेकिन रंग चोखा आए! क्या हम किसी नेता को अपना गॉडफादर बनाएं और आंख मूंदकर उसी के गुण गाएं?’
हमने कहा, ‘नेतागिरी चमकाने के लिए वादे जरूरी होते हैं। मदारी भी सांप-नेवले की लड़ाई दिखाने के वादे पर मजमा जुटाता है लेकिन उसके पिटारे और झोले से ये दोनों प्राणी कभी बाहर नहीं निकलते। फिर भी उसकी बातों में उलझकर लोग पैसा बरसाते हैं। नेताओं को बड़ा मदारी समझ लीजिए। उनके वादे जुमले बनकर रह जाते हैं। नेता मीठी बातें करनेवाला महाठग होता है। कोई नहीं जान पाता कि उसके दिल में क्या है और जुबान पर क्या?’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, राजनीति की शतरंज पर चाल चलना है तो नेता को चालबाज बनना ही पड़ता है। करोड़ों की दौलत जुटाने पर भी खुद को सादगी पसंद जनसेवक बतानेवाले नेताओं की कमी नहीं है।
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बिजनेस में घाटा आ सकता है लेकिन नेतागिरी हमेशा फायदे का सौदा है। बड़े उद्योगपतियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों को अपनी मुट्ठी में रखो। कमीशन की दौलत की बारिश में मजे से शावर बाथ लो और आजीवन पॉवर में बने रहने के हथकंडे अपनाओ। आज के जमाने में नेता की यही पहचान बन कर रह गई है। वह जनता के प्रति भक्तिभाव का दिखावा करनेवाला बगुला भगत बनकर रह गया है।’
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा