निशानेबाज: जब मुफ्तखोरी की योजनाएं हों खास तो किसे चाहिए रोजगार और विकास
चाहे महाराष्ट्र हो या झारखंड, लोग रेवड़ी चाहते हैं। कहीं लाडकी बहिण स्कीम वोट दिलाती है तो कहीं मईयां योजना ! जिस परिवार में 3-4 महिलाएं हैं, वहां बिना हाथ-पैर हिलाए गुजारे लायक रकम आ जाती है।
- Written By: दीपिका पाल
निशानेबाज में आज खास (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, “निशानेबाज, जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वह लोगों को रोजगार दे और विकास करे जिससे जनजीवन खुशहाल हो और राज्य का चेहरा-मोहरा बदले।” हमने कहा, “आपको भारी गलतफहमी हुई है। जनता को न रोजगार चाहिए न विकास ! उसे पैसा बांटनेवाली लोकलुभावन योजनाएं चाहिए। निठल्ले बैठेंगे तो चलेगा लेकिन घर बैठे 2-3 हजार रुपए की रकम हर महीने खाते में आती रहे तो चेहरे पर खुशी छा जाती है।
बहुमत से जीतनेवाली पार्टी मतदाताओं की सायकोलॉजी जान गई है। चाहे महाराष्ट्र हो या झारखंड, लोग रेवड़ी चाहते हैं। कहीं लाडकी बहिण स्कीम वोट दिलाती है तो कहीं मईयां योजना ! जिस परिवार में 3-4 महिलाएं हैं, वहां बिना हाथ-पैर हिलाए गुजारे लायक रकम आ जाती है।” पड़ोसी ने कहा, “निशानेबाज, ऐसी ही मुफ्तखोरी की योजनाएं चलती रहीं तो विकास के लिए धन कहां से बचेगा? लोग निकम्मे बनकर सोचेंगे अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम! आपको मालूम होगा कि जब छत्तीसगढ़ में बीजेपी के रमन सिंह मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने हर व्यक्ति को 35 किलो मुफ्त चावल देना शुरू किया था।
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इसलिए वह छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘चांउरवाले बाबा’ कहलाने लगे थे। लोग राशन दूकान से आधा चावल उठाते और बाकी बेचकर नकद रकम ले लिया करते थे। नतीजा यह निकला कि लोगों ने काम करना छोड़ दिया छत्तीसगढ़ और से श्रमिक आना बंद हो गए। ऐसे में यही शेर सुनाना होगा मुफ्तखोरी ने निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के!” हमने कहा, “नेताओं को फार्मूला समझ में आ गया कि न उद्योग खोलना जरूरी है, न नौकरी देना।
लुभावनी योजना के नाम पर रकम बांटों और बदले में वोट लो। जनता भी सहमत है कि पैसे बटेंगे तो वोट बिकेंगे। सवाल ये है कि ऐसे में विकास कहां से आएगा?” पड़ोसी ने कहा, “निशानेबाज, यह बहुत आसान है। जिसके घर बेटा पैदा हो, वह उसका नाम विकास रख दे। उसका बचपन से जवान होने तक शारीरिक विकास होता चला जाएगा।”
