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नवभारत विशेष: मतदाताओं के नाम काटना लोकतंत्र से मखौल, संविधान की पांडुलिपि सजाने वाले का परिवार सूची से बाहर
- Written By: आकाश मसने
West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान 34 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। ट्रिब्यूनल की सुस्ती और चुनावी अव्यवस्था ने नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर संकट खड़ा कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (डिजाइन फोटो)
West Bengal Voter List Controversy: भारत के संविधान की मूल पांडुलिपि पर चित्रण नंदलाल बोस जैसे महान कलाकार ने किया था। उनके 88 वर्षीय पोते सुप्रबुद्धा सेन का नाम SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। साथ ही सेन की 82 वर्षीय पत्नी दीपा सेन व केयरटेकर चक्रधर नायक का नाम भी मतदाता सूची से काट दिया गया था। यह तीनों उन 34 लाख लोगों में शामिल थे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश द्वारा बंगाल में स्थापित ट्रिब्यूनलों में अर्जी लगाई थी कि वह भारत के वैध मतदाता हैं, उनका मतदाता सूची से नाम हटाया जाना गलत है। इसलिए उनका नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़ा जाए। ट्रिब्यूनलों ने 510 अपीलों को इस आधार पर ठुकराया कि अर्जियां गलत तरीके से भरी गई थीं और प्रार्थियों को मतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भरना होगा।
34 लाख अपीलों में से ट्रिब्यूनलों ने अभी तक सिर्फ 147 पर ही अपना निर्णय सुनाया है, जिनमें से 139 को मतदान करने का अधिकार दिया गया है, जबकि शेष 8 को डिलीट कर दिया गया है और वह पुनःमतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भी नहीं भर सकते, उन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट की शरण लेनी होगी। यह लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है कि 34 लाख अर्जियों में से सिर्फ 147 पर फैसला लिया जाता है और वह भी मतदान से केवल एक दिन पहले? यह तो लोकतंत्र को ही बर्बाद करने की साजिश प्रतीत होती है।
जल्दबाजी में किया गया SIR
एक तो बहुत कम समय देकर जल्दबाजी में एसआईआर की प्रक्रिया कराई गई, जिससे अपर्याप्त ट्रेनिंग प्राप्त बीएलओ पर जबरदस्त मानसिक व शारीरिक दबाव पड़ा कि अनेक हृदय रोगी हो गए और कई ने आत्महत्या तक की। इस लचर व्यवस्था के कारण सही तरीके से एसआईआर होना संभव ही नहीं था। मनमाने ढंग से लाखों वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए। विरोध प्रदर्शन हुए और अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। शिकायतों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल स्थापित करने का आदेश दिया, लेकिन उसका भी नतीजा आपके सामने है।
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कोलकाता हाईकोर्ट जनहित याचिका सुनने से किया इनकार
कोलकाता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई कि 19 ट्रिब्यूनलों के कामकाज में हस्तक्षेप किया जाए और यह सार्वजनिक किया जाए कि उनकी मानक कार्य प्रक्रिया क्या है? लेकिन कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल के नेतृत्व वाली खंडपीठ ने यह कहते हुए जनहित याचिका सुनने से इनकार कर दिया कि ट्रिब्यूनलों की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई थी, इसलिए याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में ही दस्तक देनी चाहिए। बहरहाल, 22 अप्रैल 2026 को जो डाटा जारी हुआ है, उससे मालूम होता है कि एसआईआर के तहत मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने का मुद्दा कितना गंभीर है।
मुर्शिदाबाद में 74,775 मतदाताओं के नाम हटाए गए और एसआईआर के विभिन्न चरणों में यह संख्या 91,712 थी। भारत के लोकतंत्र की मजबूती का आधार ही यही है कि प्रत्येक 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के वैध नागरिक को मतदान का अधिकार है। लेकिन वैध नागरिकों को ही उनके मतदान अधिकार से वंचित किया जा रहा है। इस तथ्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अगर इस चलन पर तुरंत प्रभाव से विराम न लगाया गया तो भारत में लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा।
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एक नागरिक का मतदाता सूची से नाम मनमाने ढंग से हटा दिया जाता है और फिर उससे उम्मीद की जाती है कि वह अदालतों के चक्कर लगाए फिर से मतदाता बनने के लिए। इस कानूनी लड़ाई के लिए कितने नागरिकों के पास पैसा व समय होता है? गरीब देश में यह अन्याय नहीं तो और क्या है? मतदान न करने से किस पार्टी को फायदा होगा और किस पार्टी को नुकसान, यह तो मुद्दा ही नहीं है, सवाल यह है कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाकर या भय के कारण किसी का मतदान न कर पाना, लोकतंत्र को मजबूत करेगा या कमजोर ? इस प्रश्न पर गहन मंथन की आवश्यकता है।
34 लाख प्रार्थियों में से केवल 139 को न्याय
एसआईआर में बंगाल के 7.6 करोड़ मतदाताओं को घटाकर 6.82 करोड़ कर दिया गया है। लेकिन ट्रिब्यूनलों ने 34 लाख अर्जियों में से मात्र 139 वोटर्स को ही क्लियर किया है, जिनमें सेन, उनकी पत्नी व केयरटेकर भी शामिल हैं। क्लीयरेंस के बावजूद सेन अपनी बीमारी की वजह से बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान मतदान न कर सके।
-लेख नरेंद्र शर्मा के द्वारा
West bengal sir voter list deletion controversy 34 lakh names removed
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