संपादकीय: केंद्र प्रायोजित योजनाओं में जवाबदेही तय हो

Union Budget CAG Report: 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से पहले केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर पुनर्विचार संभव है। 4 लाख करोड़ की कई योजनाएं प्रभावहीन मानी गई हैं, जिनका पुनर्गठन हो सकता है।
Editorial: Accountability must be established in centrally sponsored schemes.
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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नवभारत डिजिटल डेस्क: आगामी 1 फरवरी को पेश किए जाने वाले केंद्रीय बजट के सम्मुख राजस्व संबंधी बाधाओं के अलावा खर्च में कटौती की गुंजाइश काफी कम रहने की संभावना है। इसे देखते हुए सरकार केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं को व्यावहारिक रूप देने पर विचार कर रही है।

यह योजनाएं लगभग 4 लाख करोड़ रुपये की हैं और कुल बजट के 8 प्रतिशत के बराबर हैं। ऐसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं में से 50 प्रतिशत की 5 वर्षीय समयावधि मार्च में समाप्त होने जा रही है। इसलिए इन पर पुनर्विचार हो सकता है, इनमें से कुछ योजनाओं में जवाबदेही का अभाव तथा नतीजे न निकलने की वजह से उनकी आलोचना की जाती रही है।

इन्हें पुनर्गठित कर फंड जारी करने से इनकी क्षमता में सुधार हो सकता है। इस दिशा में विचार करने के अलावा संबंधित पक्षों से चर्चा कर अधिक फंड जारी किए जा सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 282 के तहत केंद्र को अधिकार मिला हुआ है कि वह अपने क्षेत्र से बाहर की योजनाएं भी लागू कर सकता है।

यदि विकास में राज्य पिछड़ा रह जाए, तो ऐसी स्थिति में केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सोएसएस) को लागू किया जा सकता है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार ऐसी बहुत सी योजनाएं सक्षम नहीं हैं।

इसलिए कैचिनेट सचिव बोके चतुर्वेदी ने 2011 में तथा मुख्यमंत्रियों की समिति ने 2012 में रिपोर्ट पेश कर योजनाओं में परिवर्तन कर उन्हें सक्षम बनाने का सुझाव दिया। 15वें वित्त आयोग ने भी इसका समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि कम फंडवाली योजनाओं को रद्द कर देना चाहिए क्योंकि उनसे कोई काम ढंग से पूरा नहीं हो पाता। मुख्यमंत्रियों के पैनल ने भी कहा कि ऐसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या घटाकर 30 कर देनी चाहिए, योजनाओं का समूह बनाकर व सहायता राशि बढ़ाकर उन्हें हर सेक्टर में एक छत के नीचे लाए जाने की सिफारिश की गई।

2016 में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण पहल की गई और कहा गया कि राज्य संबंधित योजना को अपने तरीके से डिजाइन व लागू करें लेकिन इसमें केंद्रीय मार्गदर्शक तत्वों का पालन करना अनिवार्य होगा। योजना के लिए केंद्र की ओर से 25 फीसदी अनुदान दिया जाएगा जिसे राज्य फ्लेक्सी फंड के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

अब इसका आकलन किया जाएगा कि इस तरह की व्यवस्था कितनी असरदार रही। कैग की रिपोर्ट कहती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के लिए दी गई रकम का उपयोग नहीं किया गया।

केंद्र और राज्यों के योगदान में तालमेल नहीं है। यह राजनीतिक विवाद का मुद्दा भी बन गया है। इसलिए यह उचित होगा कि संविधान को समवर्ती सूची में केंद्र और राज्य अभी जो योजनाएं सम्मिलित रूप से चला रहे हैं उन्हें या तो पूरी तरह से केंद्र चलाए या राज्य को उनकी पूरी जिम्मेदारी सौंप दे। इससे जवाबदेही सुनिश्चित हो जाएगी तथा केंद्र व राज्यों के बीच तनाव भी नहीं रहेगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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