

Ukraine Suicide Ground Robots: यूक्रेन ने जंग के मैदान में कुछ महीने पहले कुछ रोबोट सैनिक उतारे थे। उसका वह प्रयोग सफल रहा था। अभी तक हवा में मंडराने और दुश्मन के ठिकाने पर आसमानी हमला कर ठिकाने तलाश कर उस पर सटीक हमले के साथ खुद को नष्ट कर लेने वाले फिदाइन ड्रोन के इस्तेमाल की खबरें आम थीं, मगर जमीन पर पहली बार फिदाइन रोबोट उतरे हैं और इससे जंग का पूरा परिदृश्य ही बदल सकता है। यूक्रेन का दावा है कि उसके भारी ड्रोन ने रूसी मोर्चे के पीछे 10 किलोमीटर से अधिक दूरी तक आत्मघाती जमीनी रोबोट पहुंचाए।
इन्होंने रूस के 3 हजार से ज्यादा सैनिकों को मार गिराया और तकरीबन सवा सौ वर्ग किलोमीटर की रूसी जमीन पर कब्जा कर लिया। इस गुप्त और बड़े तथा महत्वाकांक्षी सैन्य 'ऑपरेशन विवाल्डी' में यूक्रेन ने एक भी मानव सैनिक जमीन पर नहीं उतारे, सारा काम उन सुसाइडल रोबोट सैनिकों ने किया, जिन्हें न बारूदी सुरंगों का भय था न उन्हें उतारने वालों को उनके नष्ट होने का गम। इन रोबोट की सहायता के लिए दूसरे कॉम्बैट रोबोट, ड्रोन समेत 5 दूसरी तरह की तकनीक का भी संयोजन था।
भविष्य में यूक्रेन लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर रोबोट आर्मी और आत्मघाती रोबो सैनिकों का जत्था मैदान में उतारेगा। भले ही आत्मघाती रोबोट को दूसरी तरह की तकनीक का सहारा मिला हो, उसे दूर बैठा मानवीय ऑपरेटर संचालित कर रहा हो, उसे ड्रोन द्वारा तय इलाके तक पहुंचाया गया हो, उसका सैन्य क्षेत्र में निरापद प्रवेश हो सके इसके लिए ड्रोन के जरिए दुश्मनों की संचार प्रणाली को जैमर से बाधित की गई हो, पर इससे विस्फोटकों से लदे ग्रिफोन नामक पहिएदार फिदाइन रोबोट की शूरवीरता और युद्ध कौशल को कम नहीं आंका जा सकता, जिसने रूसी ठिकानों और सैनिकों को खोजकर और चुन-चुनकर हमले किए, उन्हें मारा और तबाह किया।
इस रोबोट की शानदार सफलता देखने के बाद युद्धग्रस्त क्षेत्रों में कई रणनीतिक बदलाव देखे जाएंगे। नाम भले यूक्रेन का हो मगर तकनीक अमेरिकी है, उधर रूस भी इस तरह के रोबोट सैनिक विकास में पीछे नहीं रहने वाला। वह भी रोबोट सैनिक जंग में उतार सकता है। ऐसे मानवरहित वाहन जो दूर बैठकर संचालित किए जा सकें जिसे 'यूजीवी' कहते हैं, जो परिवर्तित होकर रोबो सैनिक बनाए जा सकते हैं। ऐसे 32 तरह के यूजीवी रूस विकसित कर चुका है।
चीन अपने यहां युद्ध, टोही, रसद और खतरनाक अभियानों में ह्यूमनॉइड रोबोटों के इस्तेमाल पर काम कर चुका है। 5 से 10 वर्ष के भीतर ही वह अति उन्नत घातक रोबो सैनिकों की टुकड़ी पेश कर सकता है। 20 से ज्यादा दूसरे देश कॉम्बैट रोबोट बनाने की कोशिश में हैं अथवा बना चुके हैं। यह ठीक है कि अभी ये यूजीवी केवल लॉजिस्टिक सपोर्ट के काम लायक हैं जैसे युद्ध क्षेत्र में रसद, हथियार, गोला बारूद पहुंचाना, घायलों की मदद करना लेकिन इनके दर्जनों ऐसे संस्करणों पर तेजी से काम चल रहा है, जो उन्हें हमलावर बनाने वाला है।
अगर अमेरिका, रूस, चीन, यूक्रेन और दूसरे देशों के पास इस तरह की तकनीकी ताकत आती है तो सोचना होगा कि भविष्य का युद्ध क्षेत्र कैसा होगा और हार-जीत किन कारकों पर निर्भर होगी? तय है कि भविष्य का युद्ध केवल 'ड्रोन बनाम ड्रोन' नहीं रहेगा। रोबोट, ड्रोन, सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध एक ही युद्ध-तंत्र के हिस्से होंगे। इसलिए जैमिंग और संचार की लड़ाई निश्चित रूप से और तीखी होगी। यूक्रेन ने पहले ही ऐसे फाइबर ऑप्टिक ड्रोन अपनाए हैं जिन पर रेडियो फ्रीक्वेंसी जैमिंग का असर बहुत कम होता है। रूस भी उपग्रह और रेडियो संचार बाधित करने वाली प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।
भारत को 'रोबोट सेना' की केवल संख्या बढ़ाने के बजाय मैन-एंड-मशीन टीमिंग पर ध्यान देना होगा। पहले रसद, माइन-क्लीयरेंस, निगरानी, निकासी और सीमा-पहरे जैसे काम, फिर नियंत्रित युद्धक भूमिकाएं, फिर भी विश्वसनीय ह्यूमनॉइड युद्धक प्रणाली को परिपक्व बनाने में बहुत समय लगेगा, मशीन में करुणा, नैतिक विवेक या परिस्थिति के मानवीय अर्थ को समझने की क्षमता मनुष्य जैसी नहीं होती।
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा