

China Humanoid Robot Games: गत 22 से 26 अगस्त 2026 तक चीन की राजधानी बीजिंग में आयोजित दूसरे वर्ल्ड ह्यूमनोइड रोबोट गेम्स या 'रोबोटिक ओलंपिक' खेलों में 6 महाद्वीपों के 16 देशों, जिनमें अमेरिका, जापान और जर्मनी भी शामिल थे, कि 666 टीमों के 2,056 रोबोटों ने हिस्सा लिया। चीन की भागीदारी निर्विवाद सबसे बड़ी थी। 666 में से 641 टीमें चीनी थीं। रोबोटिक ओलंपिक में कुल 51 प्रतियोगिताएं शामिल थीं, दौड़, फुटबॉल, मार्शल आर्ट, नृत्य, भारोत्तोलन और टेबल टेनिस से लेकर बिस्तर लगाने, किताबें सजाने, होटल सेवाएं और आपातकालीन परिस्थितियों में काम करने जैसी चुनौतियां तक शामिल थीं।
रोबोटिक ओलंपिक के इस दूसरे संस्करण में चीन की रोबोट निर्माता कंपनी एगीबोट ने बाजी मारी, जिसने 18 स्वर्ण, 16 रजत और 12 कांस्य सहित कुल 46 पदक जीते और स्वर्ण पदक तथा कुल पदक, दोनों ही तालिकाओं में नंबर एक रही। बोटिक ओलंपिक में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी 100 मीटर की दौड़ का 8.64 सेकंड में पूरा होना यानी तिगोंग अल्ट्रा नामक रोबोट ने गति के मामले में इंसान को पीछे छोड़ दिया। उसने उसेन बोल्ट के 9.5 सेकंड के रिकार्ड को तोड़ दिया।
रोबोट की दौड़ने की शैली इंसान से अलग है और उसकी उपलब्धि का अर्थ यह नहीं कि उसने मानव एथलेटिक्स को पूरी तरह मात दे दी है। सवाल है क्या यह रोबोटिक ओलंपिक कोई नया मनोरंजन है ? जवाब है नहीं।
यह चीन के तकनीकी सुपर पावर होने का अप्रत्यक्ष रूप से किया जा रहा ऐलान है, विशेषकर इस 21वीं सदी की सबसे ताकतवर एआई और रोबोटिक्स तकनीक के मामले में। कई लोग कह रहे हैं रोबोटों को दौड़ाने की जरूरत ही क्या है? जवाब है, इसलिए क्योंकि आज भी कौशल परखने के मामले में 'खेल' सबसे कठिन प्रयोगशाला है। दौड़ने के लिए संतुलन चाहिए, फुटबॉल के लिए गेंद की गति समझनी होगी।
टेबल टेनिस में मिली सेकंड के भीतर प्रतिक्रिया देनी होगी। मुक्केबाजी में सामने वाले की गतिविधि का अनुमान लगाना होगा। नृत्य में शरीर के अनेक हिस्सों को तालमेल से चलाना होगा। मतलब यह कि खेल रोबोट के सामने एक ही समय में कई चुनौतियां पेश करते हैं, देखो, समझो, सोची और शरीर को चलाओ। एक समय था जब हम मानते थे कि कुछ काम केवल इंसान ही कर सकता है। जैसे गणना, लेकिन फिर धीरे से यह जिम्मेदारी कंप्यूटर ने ले ली। शतरंज-मशीनों ने विश्व चैंपियनों को हरा दिया।
भाषा-एआई लिखने और बातचीत करने लगा। चित्रकला-एआई तस्वीरें बनाने लगा। संगीत-मशीनें धुनें रचने लगीं। कार चलाना-स्वचालित तकनीक हर दिन आगे बढ़ रही है और अब दौड़ना, नाचना, फुटबॉल खेलना तथा टेबल टेनिस भी। मानव सभ्यता शायद पहली बार उस दौर में प्रवेश कर रही है, जब 'यह काम केवल इंसान कर सकता है' कहना लगातार कठिन होता जा रहा है। लेकिन इस अद्भुत कौशल प्रदर्शन के बावजूद रोबोट इंसान से श्रेष्ठ नहीं हो गया।
रोबोट की अभी भी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह आसान काम भी बहुत मुश्किल तरीके से करता है। रोबोट तेज दौड़ सकता है, कलाबाजी कर सकता है, भारी वजन उठा सकता है। एक साधारण इंसान जिस काम को बिना सोचे कर लेता है, वही काम मशीन के लिए अत्यंत कठिन हो सकता है। जैसे, कपड़े तह करना, गिरती हुई वस्तु पकड़ना, बिस्तर ठीक करना, अनियमित आकार की चीज उठाना, भीड़ में रास्ता बनाना, अचानक बदली स्थिति को समझना। चीन समझ गया है सुपर पावर का तमगा यूं ही नहीं मिलता ? इसमें जब कोई दूसरा प्रतिद्वंदी न हो तो खुद से ही खुद का मुकाबला करना पड़ता है।
यह सिर्फ संयोग नहीं है कि इस दूसरे रोबोटिक ओलंपिक में 666 टीमों में से 641 टीमें अकेले चीन की थीं। सुपर होने के लिए सनकी भी होना पड़ता है। इंसानी ओलंपिक में हमें केवल गति नहीं आकर्षित करती, हमें आकर्षित करती है मानवीय कहानी। किसी गरीब परिवार का बच्चा चैंपियन बन गया, कोई खिलाड़ी चोट से वापस लौटा, किसी ने हार के बाद फिर जीत हासिल की। रोबोट के पास ऐसी जीवन-कथाएं नहीं है।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा