Navabharat Nishanebaaz: बहुत उपयोगी है रेलवे का सलून किसी में पूजा, कहीं हनीमून
Railway Saloon Usage: ट्रेन के सैलून के बदलते उपयोग पर आधारित व्यंग्य में बताया गया है कि अब इसका इस्तेमाल केवल यात्रा तक सीमित नहीं, बल्कि हनीमून, पूजा-पाठ और विशेष आयोजनों के लिए भी किया जा रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल
(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: एआई फोटो)
Train Saloon Honeymoon Concept: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, इस भ्रम में मत रहिएगा कि ट्रेन सिर्फ सफर करने के लिए होती है। लोगों के उपजाऊ मस्तिष्क ने ट्रेन के सलून के विविध उपयोग खोज निकाले हैं। वह नवविवाहित जोड़े के लिए हनीमून का ठिकाना और धर्मप्रेमियों के लिए भजन-पूजन व कर्मकांड का स्थल बन सकता है। पैसा दो और सलून का जैसा चाहो, इस्तेमाल करो।’
हमने कहा, ‘आपके ध्यान में हाल ही में छपी एक खबर है, जिसमें वर्णन था कि ट्रेन के सलून का बाकायदा डेकोरेशन कर उसे पूरी साज-सज्जा के साथ हनीमून कक्ष का आकर्षक रूप दिया गया था। यह इसलिए किया गया ताकि नवविवाहित युगल को रोमांटिक फोलिंग आए। ट्रेन सफर का हर पल आनंददायक और अविस्मरणीय रहे।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, किसी हिलस्टेशन जाकर हनीमून मनाना समझ में आता है। पहाड़ पर जाकर न्यूली मैरिड कपल गा सकता है- ये वादियां, ये फिजाएं बुला रही हैं तुम्हें। पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सुरमई उजाला है, चंपई अंधेरा है! चलती ट्रेन में आपाधापी करने की क्या जरूरत ?’
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हमने कहा, ‘पहाड़ की चोटी या किले की दीवार खतरनाक होती है। इल्जाम है कि ऐसी जगह पर कोई सोनम या रिया अपने प्रेमी की मदद से पति को धक्का देकर सीधे परलोक पहुंचा देती है। इसलिए ट्रेन के सलून में पूरे सुकून के साथ हनीमून मनाना सुरक्षित है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हनीमून की बजाय भाव-भक्ति से होने वाले अर्चन-पूजन व अनुष्ठान की चर्चा कीजिए। ‘एक्स’ पर जारी एक वीडियो में पंडित सहित अनेक श्रद्धालु चलती ट्रेन में पूजा करते दिखाई दे रहे हैं। इसमें रेल विभाग का कोई नियम आड़े नहीं आता। रेलवे’ को सलून कार 3,08000 रुपये में बुक की गई और वहां धार्मिक कार्यक्रम किया गया।’
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हमने कहा, ‘आप तो सिर्फ ट्रेन की बात कर रहे हैं, धनवान भक्त क्रूज बुक करते हैं और उसमें किसी प्रसिद्ध कथावाचक या प्रवचनकार को साथ ले जाकर पूरी भव्यता से भागवत कथा करवाते हैं। तब समुद्र की लहरों के साथ मन में भक्ति की हिलोरें भी उठने लगती हैं। इधर जहाज डोलता है, उधर भजन के आनंद में भक्त भी झूमने लग जाते हैं।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
