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नवभारत डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, कुर्सी राजसत्ता का प्रतीक है। कोई नेता कुर्सी नहीं छोड़ना चाहता। उसके छूटते ही वह खुद को टूटा हुआ और बेजान महसूस करता है। छगन भुजबल इसलिए दुखी हैं कि उन्हें मंत्री पद की कुर्सी नहीं मिली। मस्साजोग के सरपंच संतोष देशमुख की हत्या के सिलसिले में महाराष्ट्र के खाद्य व नागरी आपूर्ति मंत्री धनंजय मुंडे को हटाने की मांग विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल से की है लेकिन मुंडे कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने भी कह दिया कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, मुंडे के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘जाहिर है कि अजीत ने मुंडे की कुर्सी के कवच की भूमिका निभाई है। कुर्सी कोई नहीं छोड़ना चाहता। उसके भीतर प्रिरंग के तार या फोम नहीं बल्कि भय की ऊर्जा भरी रहती है। मंत्री डरता है कि कुर्सी चली गई तो उसे कौन पूछेगा? इतिहास की समूची काल-सूची स्वर्णमंडित कुर्सियों की लोलुप आकांक्षाओं से भरी पड़ी है। अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार को बंदी बनाकर स्वयं का राजतिलक करवाया था। कुर्सी के लिए सम्राट अशोक ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारा था।”
पड़ोसी ने कहा, ‘‘कंस ने अपने पिता उग्रसेन को तथा औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को जेल में डाल दिया था। लोकतंत्र की कुर्सी पर बैठते ही कुछ नेता तानाशाह के समान मदमस्त आचरण करने लगते हैं। कुर्सी का नशा ही ऐसा होता है। अन्ना हजारे ने अपने शिष्य केजरीवाल को राजनीति के अरण्य में प्रवेश करने से मना किया था लेकिन सत्तासुंदरी के आकर्षण में केजरी कुर्सी पर जा बैठे। कुर्सी की मादकता में खुद को जनसेवक कहनेवाले नेता सत्ता के स्वामी बन जाते हैं।’’
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हमने कहा, ‘‘कुर्सी पाने के बाद उसे बचाए रखने की चिंता लगी रहती है। छोटी कुर्सी वाला हमेशा बड़ी कुर्सी पाने की चाहत रखता है। जब समय प्रतिकूल रहता है तो सत्ता का पावर मुट्ठी में भरी रेत के समान खिसक जाता है। कुर्सी किसी की सगी नहीं होती। कल उस पर कोई और था, आज दूसरा विराजमान है, भविष्य में कोई और बैठेगा। यही है किस्सा कुर्सी का!’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा