नवभारत विशेष: पोक्सो से बचाने का सुझाव कितना सही? सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाने का दिया आदेश
न्यायाधीश अभय एस ओक व न्यायाधीश उज्जल भुयान की खंडपीठ ने महिला व बाल विकास मंत्रालय के जरिए केंद्र को नोटिस जारी किया है कि वह इस मुद्दे की समीक्षा करने के लिए विशेषज्ञ कमेटी का गठन करें।
- Written By: मृणाल पाठक
सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: इश्क किसी को भी किसी से हो सकता है और जब यह होता है तो धर्म, जाति, रंग, नस्ल, आयु आदि सीमाओं का ख्याल तक नहीं रहता। इंटरनेट व सोशल मीडिया के आधुनिक युग में तो बच्चे समय से पहले ‘जवान’ व परिपक्व हो रहे हैं, शायद इसलिए किशोरों में रोमांटिक संबंध की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं।
बदलते समाज की इस हकीकत को स्वीकार करना व इस पर मंथन करना आवश्यक है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि यह किशोरों के बीच सहमति संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर विचार करे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो किशोर रोमांटिक संबंध में हैं, वह पोक्सो कानून के कड़े प्रावधानों के तहत जेल न जाएं। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह भी कहा है कि वह देशभर के लिए यौन व प्रजनन स्वास्थ शिक्षा के लिए नीति का भी गठन करे।
विशेषज्ञ समिति बनाने को कहा
न्यायाधीश अभय एस ओक व न्यायाधीश उज्जल भुयान की खंडपीठ ने महिला व बाल विकास मंत्रालय के जरिए केंद्र को नोटिस जारी किया है कि वह इस मुद्दे की समीक्षा करने के लिए विशेषज्ञ कमेटी का गठन करें और 25 जुलाई से पहले उसके समक्ष रिपोर्ट दाखिल करे। रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत आगे के निर्देश जारी करेगी।
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अदालत ने यह आदेश क्यों जारी किया? बंगाल की एक महिला की कोशिश है कि उसका पति पोक्सो कानून के तहत जेल न भेजा जाए, यह महिला जब 14 साल की थी, तो अपनी मर्जी से अपने भावी पति के साथ संबंध में थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर उसकी मदद करने के लिए दो वरिष्ठ महिला वकीलों माधवी दीवान व लिज मैथ्यू को नियुक्त किया था। इन वकीलों ने सुझाव दिया कि जो किशोर आपसी सहमति से संबंध में हैं, उनकी सुरक्षा की जानी चाहिए।
दोनों वकीलों का कहना है कि पोक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के आवश्यक उद्देश्य की पूर्ति तो जरूर करता है, लेकिन आपसी सहमति के किशोर संबंधों में भी सख्ती के साथ इसे लागू किए जाने से ऐसे नतीजे हो सकते हैं, जो अभियोजिका व उसके आश्रितों के हितों के अनुरूप न हों।
गौरतलब है कि दिल्ली व मद्रास सहित विभिन्न हाईकोर्ट्स ने ऐसे मामलों में सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाया है और पोक्सो कानून के उद्देश्यों व कारणों के विवरण की व्याख्या इस तरह से की है कि किशोरों के बीच आपसी सहमति वाले रोमांटिक संबंध को अपराध के दायरे में रखने का इरादा नहीं है।
दिल्ली की जिला अदालतों में वर्ष 2013 में जो दुष्कर्म संबंधी फैसले दिए गए, उनकी समीक्षा करने पर मालूम हुआ कि उनमें से लगभग एक तिहाई ऐसे थे, जिनमें जोड़ों ने आपसी सहमति से साथ रहने का निर्णय लिया था। उनके पेरेंट्स ने पुलिस कार्रवाई कराई।
पुलिस अक्सर लड़की के पिता की हमदर्द बन जाती है और परिवार अक्सर लड़की की बुरी तरह से पिटाई करते हैं, ताकि वह लड़के के खिलाफ बयान दे। लड़के को जेल हो जाती है और उसे सजा दी जाती है, जबकि उसने दुष्कर्म नहीं, बल्कि सहमति से संबंध स्थापित किए थे। यह सब इसलिए भी होता है, क्योंकि लड़की के लिए सहमति देने की आयु 18 साल है।
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खिलाफ है विधि आयोग
इस पृष्ठभूमि में विधि आयोग की सलाह भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसके तहत 18 वर्ष से कम के जोड़ों को पोक्सो कानून से बचाने का सुझाव दिया गया है। वर्तमान में ‘सहमति की आयु’ 18 वर्ष है। विधि आयोग ने इसे तो कम करने से मना किया है, लेकिन यौन अपराधों से बाल सुरक्षा (पोक्सो) कानून, 2012 में संशोधन करने का सुझाव दिया है कि 16-18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों में अगर ‘मौन स्वीकृति’ है, तो ऐसे मामलों को हल करने के लिए निर्देशित न्यायिक विवेक के प्रावधान को शामिल किया जाए।
कानून मंत्रालय को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि ‘आपसी सहमति के रोमांटिक संबंधों में पोक्सो के तहत आपराधिक मामलों जैसी सख्ती नहीं बरतनी चाहिए। रिपोर्ट में अदालतों को सुझाव दिया गया है कि वह ऐसे केसों में सावधानी से काम लें।
लेख- नरेंद्र शर्मा द्वारा
