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नवभारत डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देशवासियों को ‘जय हिंद’ और ‘दिल्ली चलो’ के नारे दिए थे। आजादी के बाद तमाम महत्वाकांक्षी नेता दिल्ली जाने लगे। यूपी से नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चौधरी चरणसिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, अटलबिहारी वाजपेयी, आंध्रप्रदेश से पीवी नरसिंहराव, कर्नाटक से एचडी देवेगौड़ा, गुजरात से मोरारजी देसाई और नरेंद्र मोदी दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री बने।”
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘सोनिया गांधी ने असम से राज्यसभा में लाकर मनमोहन सिंह को पीएम बनवाया था। मनमोहन के समान इंद्रकुमार गुजराल भी पंजाब के थे। दिल्ली दिलवालों की है। जिसने भी दिल्ली से दिल लगाया, वो फायदे में रहा। अरविंद केजरीवाल ने खड़गपुर से आईआईटी किया था। मदर टेरेसा के साथ रहकर सेवा कार्य किया फिर इंडियन रेवेन्यू सर्विस की परीक्षा पास की और ज्वाइंट इनकम टैक्स कमिश्नर बने।”
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल हुए और फिर आम आदमी पार्टी बनाकर दिल्ली की राजनीति में प्रवेश किया। दिल्ली में 10 वर्षों से केजरीवाल की पार्टी की हुकूमत है। पंजाब में सरकार बनाने और 6 राज्यों की विधानसभाओं में अपनी उपस्थिति दिखाकर ‘आप’ ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया।’’
हमने कहा, ‘‘शुरू में केजरीवाल की पहचान गले में मफलर और बार-बार आने वाली खांसी से थी। फिर मफलर और खांसी दोनों गायब हो गए। शायद यह बंगलुरू जाकर की गई बिपश्यना का असर था। दिल्ली से जिसका दिल लग जाता है, वह वहां के भारी प्रदूषण, कोहरे व ठंड की चिंता नहीं करता। प्रधानमंत्री मोदी को पर्यावरण में नहीं बल्कि ‘आप’ में ‘आपदा’ नजर आती है।”
हमने कहा, ‘‘विधानसभा चुनाव में आप, बीजेपी और कांग्रेस तीनों पार्टियां मतदाता से कह रही हैं- दिल दे के देखो जी! मुफ्त की रेवड़ी बांटनेवाले जनता से पूछते हैं- यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए, प्यार चाहिए कि पैसा चाहिए? समाजसेवी अन्ना के चेले केजरीवाल का असली रंग देखकर कुमार विश्वास को उन पर अविश्वास हो गया।”
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हमने कहा, ‘‘वे कवि सम्मेलन और ‘अपने-अपने राम’ का प्रवचन करने लगे। देश की प्रथम पंक्ति के नेता आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में गए थे। केजरीवाल भी शराब नीति घोटाले में जेल गए। उनकी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया चुप हैं, जबकि संजय सिंह जमकर बोल रहे हैं। देखना है, चुनाव में मुख्यमंत्री आतिशी कौन सी आतिशबाजी छोड़ेंगी!’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा