नवभारत निशानेबाज: स्टैंडअप कॉमेडियन तो सिटिंग क्यों नहीं हंसी के ठहाके बेहद जरूरी
Indian Standup Scene: हंसी के मंच पर खड़ा स्टैंडअप कॉमेडियन सिर्फ मज़ाक नहीं करता, वह सिस्टम से सवाल करता है। व्यंग्य और डर के बीच खड़ी यह कॉमेडी आज अभिव्यक्ति की लड़ाई बन चुकी है।
- Written By: अंकिता पटेल
नवभारत डिजाइन फोटो
Standup Comedy India: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, हमें बताइए कि स्टैंडअप कॉमेडियन हमेशा खड़ा क्यों रहता है? क्या वह बैठकर कॉमेडी नहीं कर सकता? सोचिए कि यदि स्टैंडअप कॉमेडियन के पैर में मोच आ जाए तो वह कैसे खड़ा रह पाएगा? ऐसे में उसकी कॉमेडी का क्या होगा। हमने कहा, ‘पुराने स्कूल मास्टर किसी शरारती लड़के को डांटकर कहते थे स्टैंडअप ऑन द बेंच। इस तरह बेंच पर देर तक खड़े रहते-राहते कुछ चालू दिमाग के बच्चे बड़े होते ही स्टैंडअप कॉमेडियन बन गए क्योंकि पढ़ाई को सीरियसली न लेते हुए उसे कॉमेडी समझते थे।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, स्टैंडअप कॉमेडियन बनना आसान नहीं है। यह एक परफॉर्मिंग आर्ट है। आपको याद होगा कि पिछले वर्ष ऐसा ही एक कॉमेडियन कुणाल कामरा एक नेता का मजाक करने वाली अपनी कॉमेडी की वजह से मुसीबत में फंस गया था।’
हमने कहा, ‘एक वक्त था जब कॉमेडियन के बिना फिल्में बनती ही नहीं थी। महमूद, जॉनीवाकर, राजेंद्रनाथ, जॉनी लिवर दर्शकों का मनोरंजन करते थे। फिल्म ‘प्यार किए जा’ में महमूद और ओमप्रकाश की कॉमेडी दिलचस्प थी। उसमें महमूद अनोखे अंदाज में हॉरर स्टोरी सुनाकर ओमप्रकाश को डराता है। ‘शोले’ में जगदीप ने सूरमा भोपाली का और असरानी ने अंग्रेजों के जमाने के जेलर का किरदार निभाया था।’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हम लोग चलते-फिरते, नाचते-गाते हास्य कलाकार की नहीं, बल्कि स्टैंडअप कॉमेडियन की बात कर रहे हैं। स्टैंडअप कॉमेडी किसी शब्द, विचार या मुहावरे से शुरू की जाती है। घिसे-पिटे पुराने जोक्स से काम नहीं चलता। कॉमेडियन को पब्लिक से कनेक्ट करना पड़ता है। लय या रिदम बनाए रखनी पड़ती है ताकि लोग बंधे रहें। यह लाइव परफॉर्मेंस होता है जिसके लिए पहले से काफी प्रैक्टिस करनी पड़ती है। हर एक-दो वाक्य के बाद श्रोताओं को हंसी आए तो ठीक, नहीं तो रिकॉर्ड की गई हंसी के फिलर्स डाल दिए जाते हैं।’
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हमने कहा, ‘राजाओं के दरबार में भी विदूषक रहा करते थे जो अपने चुटकुलों या हरकतों से राजा का तनाव दूर कर उसे खुश करते थे। शेक्सपीयर व कालिदास के नाटकों में भी क्लाउन या कोर्टजेस्टर हुआ करते थे। कभी-कभी राजनीति में भी ऐसे हुनरमंद लोग देखे जाते हैं।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
