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नवभारत संपादकीय: 6 सांसदों के विलय पर सियासी संग्राम, स्पीकर के फैसले को चुनौती देगी शिवसेना (यूबीटी)
- Written By: अंकिता पटेल
Anti Defection Law: शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के शिंदे गुट में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी के बाद नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। यूबीटी ने फैसले को चुनौती देने का फैसला किया है।

शिवसेना यूबीटी, शिवसेना शिंदे (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Shiv Sena Merger Challenge: शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के शिवसेना (शिंदे) में विलय को मान्यता देने के लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय से राजनीति में सवालिया निशान लग गया है। इस मान्यता की वजह से शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा में सिर्फ 3 सदस्य रह गए हैं। मुद्दा यह है कि कहां वैध राजनीतिक पुनर्गठन खत्म होता है और कहां दलबदल को संस्थागत स्वीकृति मिलती है।
शिवसेना यूबीटी ने स्पीकर के इस निर्णय को चुनौती देने का फैसला किया है। क्या संवैधानिक लिबास में किया गया यह विलय दलबदल है? संविधान की 10 वीं सूची इसलिए बनाई गई थी, ताकि राजनीतिक सौदेबाजी की संस्कृति पर अंकुश लगे। दलबदल विरोधी कानून में मूल रूप से पार्टियों के विभाजन का प्रावधान था। जब इसकी आड़ में आसानी से दलबदल होने लगा तो संसद ने 2003 में इस अपवाद को हटा दिया।
दल-बदल नहीं, संवैधानिक विलय पर टिकी नजर
केवल वास्तविक विलय को संवैधानिक संरक्षण मिलता है और ऐसा तब होता है, जब किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य ऐसा कदम उठाते हैं। शिवसेना यूबीटी का तर्क रहेगा कि क्या सचमुच ऐसी संवैधानिक शर्त पूरी हुई है? क्या इसमें मूल पार्टी की भावना दिखाई देती है या इसमें सिर्फ विधायक दल का गणित काम कर रहा है? यह फर्क महत्व रखता है।
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राजनीतिक दल ऐसे संगठन होते हैं, जिनका अपना संविधान, नेतृत्व का ढांचा तथा वैचारिक आधार होते हैं। विधायक या सांसद पार्टी के चुनाव चिन्ह व चुनाव घोषणापत्र के आधार पर चुने जाते हैं। वे निर्दलीय नहीं होते कि निर्वाचित होने के बाद अपना हित देखकर किसी भी पार्टी में शामिल हो जाएं।
स्पीकर की निष्पक्षता पर उठे सवाल
मुद्दा यह भी है कि क्या संवैधानिक पद पर रहकर भी स्पीकर दलबदल को बढ़ावा दे रहे हैं? हाल के वर्षों में अनेक राज्यों में स्पीकर राजनीतिक विवादों में घिरे पाए गए। उन्होंने अपना फैसला विलंब से अथवा राजनीतिक सुविधा के साथ दिया।
इसकी न्यायिक जांच हुई और जनता के मन में संदेह भी उत्पन्न हुआ। संविधान के अनुसार स्पीकर को निष्पक्ष रहना चाहिए, उसका कोई भी विवादास्पद फैसला संस्थागत निष्पक्षता की कसौटी पर परखा जाता है।
यूबीटी की चुनौती, दलबदल कानून की बड़ी परीक्षा
शिवसेना (यूबीटी) की कानूनी चुनौती सिर्फ 6 सांसदों तक सीमित नहीं है। इसमें यह प्रश्नचिन्ह है कि क्या विधायकों या सांसदों की संख्या किसी राजनीतिक पार्टी की पहचान तय कर सकती है? इस मुद्दे का फैसला देश में भावी दलबदल को प्रभावित करेगा।
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क्योंकि चुनावी नतीजे आने के बाद ऐसा ही सिध्दांतहीन दलबदल का दौर शुरू हो जाता है। इससे चुनाव का जनादेश बदल जाता है। लोकतंत्र केवल संख्यात्मक सुविधा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि दलबदल के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा उपायों की व्याख्या में ढील दी गई, तो दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक अवसरवादिता को रोकने की बजाय उसे वैध ठहराने का जरिया बन जाएगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Shiv sena ubt six mps merger speaker decision anti defection row
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