

Sachin Ahir Anti Defection Law MLC Election: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर दलबदल विरोधी कानून को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर के एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने और उपसभापति पद के लिए नामांकन भरने के बाद कानूनी गलियारों में एक बड़ा सवाल तैर रहा है। सवाल यह है कि क्या अपनी पार्टी के खिलाफ बगावत करने पर सचिन अहीर की विधायकी चली जाएगी?
जानकारों और विधायिका के नियमों के मुताबिक, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बेहद सोची-समझी कानूनी रणनीति के तहत सचिन अहीर को अपने पाले में किया है। सचिन अहीर के इस कदम के बावजूद उन पर दलबदल विरोधी अधिनियम के तहत कोई दंडात्मक या अयोग्यता की कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसके पीछे संविधान की दसवीं अनुसूची का एक बेहद महत्वपूर्ण और खास प्रावधान ढाल बनकर खड़ा है, जिसने ठाकरे गुट के कानूनी रणनीतिकारों को भी असमंजस में डाल दिया है।
दरअसल, भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जो दलबदल विरोधी कानून से संबंधित है, उसमें कुल 8 अनुच्छेद शामिल हैं। इनमें से अनुच्छेद 5 कुछ विशेष संवैधानिक पदों पर आसीन या निर्वाचित होने वाले व्यक्तियों को इस कठोर कानून से पूर्ण रूप से छूट प्रदान करता है। इस नियम के तहत यदि कोई सदस्य सदन का अध्यक्ष (Speaker) या उपाध्यक्ष/उपसभापति चुना जाता है, तो उसे अपनी मूल राजनीतिक पार्टी से अलग होने की कानूनी आजादी मिलती है।
इस नियम के मुताबिक, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, तथा राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों के अध्यक्ष व उपसभापति के पदों पर नियुक्त होने वाले व्यक्तियों को दल-बदल कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। चूंकि सचिन अहीर ने महायुति की तरफ से विधान परिषद के उपसभापति पद के लिए आधिकारिक तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है और सदन में महायुति का स्पष्ट बहुमत है, ऐसे में उनका चुना जाना लगभग तय है। पद संभालते ही उन्हें यह विशेष संवैधानिक सुरक्षा कवच मिल जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उद्धव ठाकरे जब एक तरफ राज्य भर में घूमकर महायुति और एकनाथ शिंदे पर हमलावर हैं, ठीक उसी समय शिंदे ने उनके गढ़ मुंबई में यह बड़ा 'सर्जिलकल स्ट्राइक' किया है। वर्ली विधानसभा क्षेत्र में आदित्य ठाकरे की जीत की मुख्य रीढ़ रहे सचिन अहीर को अपने साथ लाकर शिंदे ने न केवल ठाकरे समूह के विधायकों की संख्या घटाकर 5 कर दी है, बल्कि आगामी चुनावों से पहले मुंबई में अपनी राजनीतिक जमीन को भी कानूनी और रणनीतिक रूप से बेहद मजबूत कर लिया है।