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बेकाबू होता जा रहा वित्तीय घाटा, आर्थिक सुधारों के दूसरे दौर की ज़रूरत

अधिकांश लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड केवल 8 प्रतिशत से अधिक की तेज विकास दर से ही बेहतर हो सकता है, लेकिन यह आर्थिक सुधारों के दूसरे दौर से ही संभव हो सकेगा।

  • Written By: मृणाल पाठक
Updated On: Dec 30, 2024 | 02:29 PM

निर्मला सीतारमण (डिजाइन फोटो)

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नवभारत डेस्क: यद्यपि 1991 की तुलना में अब तक जीडीपी 14 गुना बढ़ चुका है, फोरेक्स रिजर्व जो जनवरी 1991 में 1 बिलियन डॉलर था अब 650 बिलियन डॉलर हैं। प्रति व्यक्ति जीडीपी 300 डॉलर से 9 गुना बढ़कर लगभग 2700 डॉलर हो गया है। हमें सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, फूड सुरक्षा का अधिकार, मनरेगा के रूप में रोजगार की गारंटी और इस किस्म के अन्य अनेक अधिकार मिले।

इसके बावजूद हम गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं। पीपीपी के हिसाब से हम 222 देशों में 150 वें स्थान पर हैं। अधिकांश लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड केवल 8 प्रतिशत से अधिक की तेज विकास दर से ही बेहतर हो सकता है, लेकिन यह आर्थिक सुधारों के दूसरे दौर से ही संभव हो सकेगा।

आज की राजनीति एकदम अलग है। गठबंधन सरकार में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शक्तिशाली बॉस हैं, कल्याण व अधिकारों की सक्रियता के साथ ही विकास पर भी फोकस किया जा सकता है। अगर आप विकास को अनदेखा कर देंगे तो परेशानियां, कठिनाइयां व समस्याएं आपकी प्रतीक्षा में रहेंगी, आज जब हर राजनीतिक पार्टी मतदाताओं को रिझाने व पटाने के लिए एक नई कैश ट्रांसफर योजना के बारे में मंथन कर रही है, और कोई पार्टी विकास नीतियों के बारे में बात ही नहीं करना चाहती तो यह तथ्य अधिक प्रासंगिक व महत्वपूर्ण हो जाता है।

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आर्थिक सुधार तो ऐसा मंत्र बन गया है, जिसका कोई अर्थ ही नहीं है। दूसरा यह कि विकास व प्रोजेक्ट कार्यों को पर्यावरण के मुकाबले में न रखा जाये। जो सुधार कार्यक्रम कहीं बीच में खो गये उन्हें फिर से तलाश करके रास्ते पर लाया जाये ताकि हर नागरिक चैन की सांस ले सके.

बेकाबू होता जा रहा वित्तीय घाटा

  • लगभग 20 साल पहले भारत ने फिस्कल रिस्पॉसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट के जरिये लक्ष्य रखा था कि वह फिस्कल घाटे को जीडीपी के 3 प्रतिशत से कम रखेगा। लेकिन 3 प्रतिशत केवल सपना ही रहा है।
  • कोविड के बाद 2020-21 में घाटा बढ़कर 9।2 प्रतिशत हो गया और फिर पिछले साल धीरे-धीरे कम होकर 5.8 प्रतिशत हुआ, जो अब भी बहुत ज्यादा है,
  • घाटे को नियंत्रण में रखने से प्राइवेट निवेश और मध्यम ब्याज दरों के लिए पैसे को मुक्त रखा जा सकता है, लेकिन यह सब्सिडी और मुफत की रेवड़ियां बांटने से तो नहीं होने जा रहा है।
  • श्रमिकों की बहुत बड़ी संख्या के पास कोई पेंशन कवर नहीं है। जिनके पास है, उनमें से प्राइवेट जॉब्स में अधिकांश अपने भविष्य की आय सुरक्षा के लिए खुद पे करते हैं।
  • केवल सरकारी जॉब्स में कुछ के पास यह सुविधा है कि करदाताओं की कीमत पर वह पेंशन पा रहे हैं। सरकार इस व्यवस्था से अलग होती जा रही थी। जो भविष्य पर बोझ डालती है, लेकिन राजनीतिक दबाव उसके इरादों की परीक्षा ले रहा है।
  • पुरानी पेंशन योजना पर लौटने से ‘अधिक जनसंख्या के लिए अधिक अच्छाई को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, इसलिए इससे बचना चाहिए। भारत की कर व्यवस्था अपराध बोध के अनुमान पर कार्य करती है। कर विवाद वर्षों तक खिंचते रहते हैं।

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  • फिर आयकर का भी असमतल बोझ है, जिसे जनसंख्या का 2 प्रतिशत से भी कम अपने कंधों पर उठाये हुए है, कर वेस का विस्तार करना आवश्यक है ताकि सरकार के पास विकास के लिए अधिक कर राजस्व आ सके। इनके अतिरिक्त भी बहुत सी चीजें हैं, जिनमें सुधार की गुंजाइश व जरूरत है।

लेख- शाहिद ए चौधरी द्वारा

Second round of economic reforms is needed

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Published On: Dec 30, 2024 | 02:29 PM

Topics:  

  • Narendra Modi
  • Nirmala Sitharaman

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