Navabharat Nishanebaaz: राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट, अंतकाल पछताएगा, प्राण जाएंगे छूट

Ram Temple Controversy: व्यंग्यात्मक अंदाज में आस्था, मंदिरों की संपत्ति और उसके प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए भ्रष्टाचार और लालच की मानसिकता पर कटाक्ष किया गया है।
Navabharat Nishanebaaz: It is a bounty of the Lord's name plunder it while you can; for when the end comes and life slips away, you will only be left with regret.
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
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Ayodhya Temple Fund Mismanagement: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, हमारे देश के प्रसिद्ध प्राचीन मंदिरों को विदेशी आक्रमणकारी लुटेरों ने बार-बार लूटा। उनकी लालची नजरें मंदिरों के बहुमूल्य खजाने पर थी जिसमें सोना-चांदी और हीरा-मोती माणिक जैसे रत्नों का भंडार भरा रहता था।'

हमने कहा, 'अब विदेशी लुटेरों की कहानी भूल जाइए। अपने स्वदेशी लुटेरे क्या कम हैं। अयोध्या के भव्य राममंदिर में भक्तों ने भंडार भरा और वहां का प्रबंध संभालने वाले कर्ताधर्ताओं ने उससे अपना घर और जेब भर ली। इधर आंख झपकाई और उधर माल यारों का! चोरों ने चतुराई से सोचा कि भगवान को धन की क्या जरूरत है। जब राम, सीता, लक्ष्मण 14 वर्ष के लिए वनवास गए थे तो उनके पास कैश, चेक, ड्राफ्ट, क्रेडिट कार्ड कुछ भी नहीं था। टिफिन या राशन पानी तक नहीं ले गए। कंद-मूल-फल खाकर तपस्वी जीवन बिताया।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, अयोध्या में रामलला का मंदिर है जिसमें वह बालक के रूप में विराजमान हैं। बालक को धन से क्या प्रयोजन! अयोध्या में इतना धन और महल का सुख था, लेकिन राम-लक्ष्मण बचपन से वशिष्ठ मुनि के आश्रम में भेज दिए गए जहां कठोर और सादगीपूर्ण दिनचर्या थी। वहां से अयोध्या लौटे ही थे कि विश्वामित्र उन्हें अपने साथ यज्ञ की रक्षा करने और मारीच-सुबाहू को मारने ले गए, विवाह के बाद चैन से रह पाने का अवसर भी नहीं मिल पाया कि कैकेयी ने वनवास भेज दिया। मंदिर से नकद रकम और सोना चांदी के आभूषण पर हाथ साफ करने वाले कर्मचारियों और धर्म को धंधा बनाने वाले उनके आकाओं ने समझ लिया कि रामलला को धन की क्या आवश्यकता! भगवान में मन लगाने की बजाय चढ़ावे के धन पर निगाह रखी।

जीवन की यात्रा अर्थ से शुरू होती है फिर धर्म, काम और मोक्ष की बारी आती है। अर्थशास्त्र यही कहता है- राम नाम जपना, पराया माल अपना! मंदिर निर्माण के लिए देश-विदेश से चंदा जमा किया। देशवासियों का सहभाग दिखाने के लिए 'राम शिला' के नाम से इंटें मंगवाई गई लेकिन मंदिर पत्थर से बनवाया गया। मंदिर परिसर के विस्तार और भव्यता के लिए औने-पौने दाम पर जमीन अधिग्रहण किया गया और फिर करोड़ों में जमीन बेच दी गई, निर्माण घोटाले में जमकर कमीशनखोरी की गई। राम के नाम पर की गई धांधली की न तो आरएसएस निंदा कर रहा है न बीजेपी के महान नेता। छुटभैये चोर फंस जाएंगे और बड़े देखते ही देखते चंपत हो जाएंगे! एसआईटी की जांच पूरी होने के पहले ही मंदिर निर्माण समिति के प्रमुख उपेंद्र मिश्रा ने ट्रस्ट के सचिव चंपत राय को क्लीन चिट दे दी।'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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