संपादकीय: आत्मचिंतन का पर्व हो हमारा गणतंत्र दिवस
Responsible Citizenship: गणतंत्र दिवस पर आत्ममंथन जरूरी है—क्या हम संविधान के मूल्यों के प्रति ईमानदार हैं? अधिकार के साथ कर्तव्य और नैतिक मतदान ही गणतंत्र को सशक्त बना सकते हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: गणतंत्र दिवस के महान राष्ट्रीय पर्व पर हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या हम भारतीय गणराज्य के जिम्मेदार नागरिक हैं? क्या हम संविधान की प्रस्तावना में वर्णित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं? अपने अधिकार के साथ क्या हम कर्तव्य या दायित्व की महत्ता भी समझते हैं? नई पीढ़ी को इसका बोध होना चाहिए कि लगभग 2 सदियों की गुलामी के बाद यदि हमारा भारत स्वतंत्र, सार्वभौम गणतंत्र बना तो यह बहुत बड़ी नियामत है।
हम उन आदर्शों के लिए जिएं जो शहीदों और पहली पीढ़ी के नेताओं ने दिए थे। यदि हम दवाव या प्रलोभन में आकर भ्रष्ट नेताओं को चुनते हैं तो हमें भ्रष्टाचार की शिकायत करने का कोई नैतिक हक नहीं है। आज हमारा गणतंत्र सत्तालोलुपता, दल-बदल व अवसरवाद का नंगा नाच देख रहा है। केंद्र और राज्यों के संबंधों में सहयोग की बजाय टकराव देखा जा रहा है।
खास तौर पर विपक्षी पार्टी या गठबंधन द्वारा शासित राज्यों के प्रति केंद्र का रवैया भेदभावपूर्ण बना रहता है। हमारे राज्यों को उनका हक मिलना चाहिए, क्योंकि राज्य ही गणतंत्र या रिपब्लिक का निर्माण करते हैं। अब वह ब्रिटिश शासन के समय के कमजोर प्रांत या सूबे नहीं रहे, बल्कि अधिकार संपन्न राज्य हैं।
सम्बंधित ख़बरें
One Nation, One KYC: अब बार-बार केवाईसी की झंझट खत्म, सरकार ला रही ‘पोर्टेबल केवाईसी’ व्यवस्था
भारत-न्यूजीलैंड FTA: कीवी और वाइन होंगे सस्ते, किसानों के लिए डेयरी और दालों पर मोदी सरकार ने लिया बड़ा फैसला
सार्क की तरह बिखर जाएगा BRICS? ईरान की जिद और अमेरिका के दबाव ने बढ़ाई भारत की टेंशन, क्या करेंगें PM मोदी
27 अप्रैल का इतिहास : मुगल सल्तनत से जुड़ी, तीन बड़ी घटनाओं का दिन जानिए पूरा इतिहास
यह एकात्मक नहीं संघात्मक व्यवस्था है, जिसमें केंद्र व राज्य के अधिकार अलग-अलग दर्शाए गए हैं और संविधान की समवर्ती सूची में ऐसे विषय हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दीनों ही कानून बना सकते हैं। फिलहाल कुछ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच सहयोग की बजाय टकराव के मामले बढ़ गए हैं।
राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त संवैधानिक प्रमुख हैं और उनके अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या संविधान में वर्णित है, लेकिन अब वह विधानमंडल द्वारा पारित बिलों को मंजूरी देने की बजाय लंबे समय तक अटकाने, अभिभाषण न पढ़ने, वॉकआउट करने लगे हैं। क्या यह संविधान में अभीष्ट है? अंग्रेजों के जमाने के लाट-गवर्नरों की मनमानी अलग थी।
गणतंत्र में राज्यपाल की भूमिका सकारात्मक होनी चाहिए, स्वाधीनता की परिपूर्णता गणतंत्र में है। स्मरण रहे कि 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद भी हमारा देश उपनिवेश था, जहां चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य अंतिम गवर्नर जनरल थे। देश में करंसी नोट, डाक टिकट, स्टैम्प पेपर पर ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज षष्टम के चित्र छपे रहते थे। रियासतों के विलय की जिम्मेदारी सरदार पटेल निभा रहे थे। 26 जनवरी 1950 को हमारा राष्ट्र संप्रभु गणतंत्र बना। हमने अपना संविधान अंगीकार किया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने थे।
यह भी पढ़ें:-नवभारत विशेष: 26 जनवरी 1930 था पूर्ण आजादी का संकल्प दिन
खेद है कि विश्व में साम्राज्यवाद की निंदनीय मानसिकता अब भी बनी हुई है। टैरिफ के अख से दबाने की कोशिश की जा रही है। महात्मा गांधी ने कुछ सोचकर ही स्वावलंबन सिखाया था लेकिन भूमंडलीकरण व जीवनशैली में परिवर्तन के चलते सभी देश व्यापार के लिए एक-दूसरे पर आश्रित हो गए हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
