राजनीति है पारे की गोली, समझना कठिन नेताओं की बोली
- Written By: चंद्रमोहन द्विवेदी
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, हमें लगता है कि राजनीति पारे की गोली के समान है जिसे पकड़ पाना बेहद मुश्किल है. वह तुरंत छिटक जाती है. ऐसे ही कुएं की गहराई तो नापी जा सकती है लेकिन घाघ नेताओं की मुखमुद्रा या बॉडी लैंग्वेज से पता नहीं चल पाता कि उनके सोच की गहराई कितनी है.’’
हमने कहा, ‘‘यह मानकर चलिए कि नेता के कहने और करने में फर्क होता है. उसका इनकार कब इकरार बन जाए, कहा नहीं जा सकता. नेता चाहे तो दावा कर सकता है कि मैं जो कहता हूं, वह करता हूं लेकिन जो नहीं कहता वो डेफिनिटली करता हूं.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने फुल एंड फाइनल इनकार करते हुए कहा कि वो कभी बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे. उनके लिए यह सिद्धांत का सवाल हैं. शायद वो बताना चाहते हैं कि एनसीपी की छवि सेक्यूलर पार्टी की रही है.’’
हमने कहा, ‘‘याद कीजिए कि गठबंधन की राजनीति में सिद्धांत आड़े नहीं आते. जब जनता पार्टी बनी थी तो उसमें जनसंघी, समाजवादी और पूर्व कांग्रेसियों की भागीदारी थी. अटल-आडवानी के साथ मधु लिमये, राजनारायण जैसे समाजवादी और मोरारजी देसाई जैसे पूर्व कांग्रेसी एकजुट हुए थे.’’
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पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, शरद पवार दूरदर्शी हैं. वे अपने विकल्प या आप्शन खुले रखेंगे. 2024 के चुनाव में यदि किसी भी गठबंधन का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो पवार का वारगेपिंग पावर बढ़ जाएगा. एनडीए और इंडिया दोनों गठबंधन उनके सहयोग पर निर्भर हो जाएंगे. इसलिए पवार फिलहाल अपने पत्ते खोल नहीं रहे हैं. वे बहुत दूर की सोच रखकर चलते हैं.
