Navabharat Nishanebaaz: कब तक छिपेंगे अमित शाह, राहुल-खड़गे देखते राह
Kharge Parliament Demand: निशानेबाज के व्यंग्य में खड़गे के बयान पर तंज कसते हुए कहा गया कि छिपना कोई नई बात नहीं, इतिहास, परंपरा और रणनीति में इसके कई उदाहरण मिलते हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Modi Parliament Response Row: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद में आकर जवाब दें, खड़गे ने यह भी कहा कि आप कमरे में कब तक छिपेंगे?’
हमने कहा, ‘किसी के छिप जाने से इतनी बेचैनी क्यों होनी चाहिए, लुका-छिपी का खेल तो चलता ही रहता है। बारिश और ठंड के मौसम में सूरज कभी दिखाई देता है तो कभी बादलों की ओट में छुप जाता है। चंद्रमा भी अमावस को पूरी तरह छिप जाता है। छुपना हमारी पुरानी परंपरा में है। भगवान भी भक्त को दर्शन व वरदान देने के बाद अंतर्धान हो जाते थे। अर्जुन ने शिखंडी के पीछे छिपकर भीष्म पितामह पर बाण चलाए थे। भगवान राम ने वृक्षों के पीछे छिपकर बाली पर बाण छोड़ा था। छुपना एक रणनीति या स्ट्रेटजी है। सेना भी बंकर बनाती है और ट्रॅचेस या खाई खोदती है और वहां से छुपकर दुश्मन पर गोलियां दागती है। जब सिपाही पीछा करता है तो चोर चालाकी से छिप जाता है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, छिपने को लेकर इतने उदाहरण देने की जरूरत नहीं है। खड़गे की मांग है कि अमित शाह छिपने की बजाय संसद में आकर बताएं कि आंदोलनकारी छात्रों पर गोली किसने चलाई थी। राहुल गांधी ने भी लोकसभा में कहा था कि 2 ही रास्ते हैं।
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या तो शाह कबूल करे कि उन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया था अथवा यह बताएं कि उन्हें मालूम नहीं था कि गोली चलाई जा रही है। पहले मामले में वह दोषी हैं और दूसरी स्थिति में वह अक्षम हैं। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने भी शाह पर छिपने का आरोप लगाया।’
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हमने कहा, ‘छिपने को फिल्मों में भी महत्व दिया गया हैं। आपने गीत सुने होंगे छुप गया कोई रे दूर से पुकार के, दर्द अनोखे हाय दे गया प्यार के ! छुपनेवाले सामने आ, छुप-छुप के मेरा जी न जला, सुरज से किरण-बादल से पवन कब तलक छुपेगी ये तो बता! देखो ये चांद छुप के करता है क्या इशारे, तुम हो गए हमारे हम हो गए तुम्हारे ! छुपा लो यूं दिल में प्यार मेरा जैसे मंदिर में लौ दिए की! तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां!’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, फिल्मों की रील लाइफ की बात छोड़िए रीयल लाइफ में नेता जवाबदेही टालने के लिए छिप जाते हैं।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
