भारत में वन नेशन वन इलेक्शन, आसान होगा या फिर बढ़ाएगा टेंशन?
देश में इस समय 'वन नेशन वन इलेक्शन' की चर्चा जोरों पर है। केंद्र की मोदी सरकार उसे इंप्लीमेंट करना चाहती है, जब विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। सरकार पक्ष में तर्क दे रही है और विपक्ष इसकी खामियां गिना रहा है। ऐसे में अगर 'वन नेशन वन इलेक्शन' लागू होता है तो सही मायनों में क्या फायदा और नुकसान होगा? इस पर आपको नवभारत के 'निशानेबाज' की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी पढ़नी चाहिए।
- Written By: मृणाल पाठक
एक राष्ट्र एक चुनाव (डिजाइन फोटो)
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, वन नेशन वन इलेक्शन के मुद्दे पर आपकी क्या राय है? यदि एक ही बार में ग्रामपंचायत, जिला परिषद, नगरपालिका, मनपा, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव निपट जाएं तो राजनीति में स्थिरता और निश्चिंतता आ जाएगी। नागरिकों को बार-बार मतदान केंद्र जाकर वोट डालने की झंझट से छुटकारा मिलेगा। प्रशासनिक मशीनरी व शिक्षकों को भी इससे तसल्ली होगी। सुरक्षा बलों को भी बार-बार तैनात करना नहीं पड़ेगा। वन नेशन वन इलेक्शन का मतलब है तुरंत दान महापुण्य!’’
हमने कहा, ‘‘चुनाव लोकतंत्र का पर्व या त्योहार होता है। जब हम साल भर कोई न कोई त्योहार मनाते हैं तो चुनाव भी उत्साहपूर्वक बार-बार कराते रहना चाहिए। इससे राजनीति चलायमान रहती है। नेता भी सक्रिय बने रहते हैं। चुनाव सभाओं या रैलियों का इंतजाम करनेवालों और किराए की भीड़ लानेवालों को रोजगार मिलता है। कार्यकर्ताओं को बार-बार खर्च-पानी की रकम मिलती है।’’
हमने कहा, ‘‘नेताओं को बार-बार गला फाड़कर भाषण देने और एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का चांस मिलता है। टीवी पर विभिन्न पार्टियों के प्रवक्ताओं को भड़ास निकालने का अवसर हासिल होता है। नए नारे और जुमले गढ़नेवालों को रोजगार मिलता रहता है। हर चुनाव में मुफ्त की खैरात बांटनेवाली घोषणाएं होती हैं। इसलिए बार-बार लगातार चुनाव होते रहने चाहिए। एक साथ सारे चुनाव निपटा लिए तो इन लोगों का क्या होगा?’’
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पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, एक राष्ट्र एक चुनाव से खर्च बचेगा। लोग गया जाकर इसलिए श्राद्ध करते हैं कि एक बार में ही पितरों को मुक्ति मिल जाए। मतदाता भी एक बार वोटिंग करने के बाद 5 साल तक टेंशन फ्री हो जाएंगे। हर साल किसी न किसी चुनाव में उंगली पर स्याही लगाने से छुटकारा मिलेगा।’’
हमने कहा, ‘‘यदि एक बार किसी पार्टी की सरकार आ गई तो 5 साल तक मनमानी करेगी। अविश्वास प्रस्ताव लाकर गिराने का चांस नहीं रहेगा क्योंकि चुनाव तो 5 साल बाद ही कराया जाएगा। बड़ी पार्टियों के चुनाव प्रचार का बुलडोजर अल्पसाधनों वाली छोटी पार्टियों को रौंद देगा। विपक्ष कितना ही चिल्लाए, सरकार अंगद के समान पैर जमाकर टिकी रहेगी और टस से मस नहीं होगी।’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
