नवभारत विशेष: तेजी से सूखते जलाशय, गहराता जल संकट, भविष्य की डरावनी चेतावनी सुनें..
India Water Crisis: केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट ने डराया! भारत के 150 प्रमुख जलाशयों में जलस्तर गिरकर आधे से कम रह गया है। मानसून की आशंका और बढ़ती गर्मी के बीच गहराता राष्ट्रीय जल संकट।
- Written By: आकाश मसने
सुख रहे जलाशय (डिजाइन फोटो)
India Water Crisis 2026 Report: केंद्रीय जल आयोग की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि देश के सभी प्रमुख 166 जलाशय तेजी से सूख रहे हैं और उनमें आधा भी पानी नहीं बचा है। गर्मी के तीन महीने अभी बाकी हैं और मानसून के कमजोर रहने के आशंका के बीच इस आसन्न जल संकट से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है और उसे क्या करना चाहिए? तेल संकट का प्रबंध तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर लेगी, लेकिन इस राष्ट्रीय जल संकट से कैसे निपटेगी? देश के 8 प्रमुख जलाशय तो ऐसे हैं जहां पानी सामान्य का 50 प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है। मौसम विभाग के अनुसार मानसून के कमजोर रहने की आशंका है।
जलाशयों का स्तर मात्र 33 प्रतिशत बचा
आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत में जलाशयों का स्तर मात्र 33 प्रतिशत ही रह गया है, उधर लगभग सभी नदियों के प्रवाह क्षेत्र अथवा रिवर बेसिन में पानी की मात्रा घटती जा रही है। कई नदी बेसिन 30-60 प्रतिशत के बीच हैं। गंगा, गोदावरी, नर्मदा जैसे बड़े बेसिन आधी क्षमता के आसपास हैं तो कृष्णा मात्र 31 प्रतिशत और कई तटीय बेसिन 25-35 फीसद के स्तर पर सिमट चुके हैं। पूर्वी तटीय नदियों में सिर्फ 25 प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा, तो पश्चिमी तटीय नदियों में 35 प्रतिशत पानी ही बचा है।
जल संकट का असर किस पर पड़ेगा ?
मानसून से पहले देश के जलाशयों और नदी बेसिनों में तेजी से गिरता जलस्तर केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि एक उभरते हुए जल संकट का संकेत है। इसका दुष्प्रभाव पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कृषि, ऊर्जा उत्पादन सभी पर व्यापक प्रभाव डालेगा। 2001 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1816 घन मीटर थी, जो 2011 में घटकर 1545 और ताजे आकलन के तहत यही हाल रहा तो 2031 तक 1300 घन मीटर रह जाएगी।
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जल संकट अब केवल सूखे क्षेत्रों तक सीमित नहीं बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले रहा है। आने वाले महीनों में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में पेयजल संकट तो सामने आयेगा ही, खरीफ सीजन की तैयारी भी प्रभावित होगी जो कृषि संकट को जन्म देगी, जलविद्युत उत्पादन घटने से ऊर्जा संकट भी पैदा होगा। इसके अलावा नदियों का प्रवाह घटेगा, जैव विविधता पर असर पड़ेगा।
वेटलैंड्स प्राकृतिक जल संग्रहण हैं, उचित जल संरक्षण के अभाव में ये सूख रहे हैं। वर्षा चक्र का असंतुलन जलाशयों की पुनर्भरण क्षमता को प्रभावित करता है पर यह केवल आंशिक कारण है। इसका सारा ठीकरा केवल मौसम पर फोड़ना ठीक नहीं, हमारा जल प्रबंधन भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं। अत्यधिक जल दोहन को रोकने के लिये हमारे उपाय बिल्कुल बे-असर हैं। सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए जलाशयों से पानी तो लगातार निकाला जा रहा है जबकि पुनर्भरण की व्यवस्था बेहद कमजोर है।
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जहां तक नदियों के प्रवाह क्षीण होने, उनके बेसिनों का क्षरण तथा उसमें कम पानी होने की वजह का सवाल है, उसके लिये जिम्मेदार हैं उनके कैचमेंट एरिया में वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और अनियोजित निर्माण, इन सबने प्राकृतिक जल संचयन क्षमता को कम कर दिया है, इसके अलावा वेटलैंड्स और या आर्द्रभूमि तथा जलस्रोतों का अतिक्रमण हमारी राष्ट्रीय समस्या है, विकास के नाम पर झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों को या तो पाट दिया गया या उन्हें कंक्रीट संरचनाओं में बदल दिया गया। जमीन को सीमेंट कंक्रीट से ढकने के परिणामस्वरूप वर्षा का पानी जमीन में समाने की बजाय बहकर निकल जाता है। भारत जल संकट के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां लापरवाही भविष्य को संकटग्रस्त बना सकती है।
भविष्य की डरावनी चेतावनी सुनें
वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने के तहत हर शहर और गांव में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग लागू करना होगा, तो भवन निर्माण नियमों में भी जल के सीमित उपयोग पर सख्ती दिखानी होगी। वेटलैंड और जलस्रोतों के संरक्षण, उनका अतिक्रमण हटाने, झीलों और तालाबों का पुनर्जीवन के लिए फिलहाल के उपाय सीमित दिखते हैं, सघन राष्ट्रीय अभियान की जरूरत है। नदी बेसिन प्रबंधन हेतु कैचमेंट क्षेत्रों में वृक्षारोपण मिट्टी संरक्षण और भूजल पुनर्भरण योजनाएं तेज करनी होंगी। ज्यादा पानी इस्तेमाल करने वाली फसलों को कैसे रोकें देखना होगा। यदि समय रहते जल संरक्षण, प्रबंधन और पुनर्भरण की दिशा में ऐसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘सूखी नदियां और रीते जलाशय’ भविष्य की स्थायी तस्वीर बन सकते हैं।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा
