प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Mumbai Pune Expressway Jam: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, इतिहास बताता है कि अफगान शासक शेरशाह सूरी ने बिहार से दिल्ली तक ग्रैंड ट्रक रोड बनवाया था। इसके दोनों ओर आम के वृक्ष लगवाए थे ताकि सेना उस रास्ते से जाते हुए फल खा सके। इसे कहते हैं दूरदर्शिता अथवा आम के आम, गुठलियों के भी दाम।’
हमने कहा, ‘आप जीटी रोड की बजाय महाराष्ट्र के मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर 32 घंटे तक लगे महाजाम की त्रासदी पर ध्यान दीजिए। एक गैस टैंकर दुर्घटनाग्रस्त होकर पलट जाने से वहां कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। इसमें हजारों वाहन फंस गए जो न आगे जा सकते थे न पीछे। लोग खाने-पीने, दूध-चाय, टॉयलेट के लिए तरस गए, जहां कार है वहीं अटके रहो। किसी दुश्मन के साथ भी ऐसी हालत न हो। अमेरिका में हाईवे पर जगह- जगह एग्जिट हैं लेकिन अपने यहां ऐसा नहीं है इस वजह से वाहनों को वापस मोड़ पाना संभव नहीं है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हम विकास की कीमत चुका रहे हैं। जब कच्ची सड़कें थीं तो घोड़े और बैलगाड़ियों से लोग सफर करते थे। अब जितने हाईवे और एक्सप्रेसवे बनते हैं, उतनी ही ज्यादा तादाद में कारें, ट्रक व टैंकर सड़कों पर आ जाते हैं। इसकी वजह से लग जाता है जाम! दिल्ली-गाजियाबाद-नोएडा में यह समस्या है आम! जाम में मोबाइल की बैटरी डाउन हो जाती है। मन में लगता है कि जैसे कोई कह रहा है- घर कब आओगे कि ये तुम बिन ये घर सुना है।’
हमने कहा, ‘जाम की समस्या कहां नहीं है। परीक्षा देते समय विद्यार्थी का दिमाग जाम हो जाता है। समझ में नहीं आता कि क्या लिखे। किसी बोतल या डिब्बे का ढक्कन जाम हो जाना आम बात है। स्याही सूख जाने से बॉलपेन जाम हो जाती है। जनसमस्याओं को लेकर रास्ता जाम आंदोलन होते हैं। ट्रैफिक वाले जैमर लगाकर गाड़ियों को रोक देते हैं।’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, सत्ता में एकाधिकार जमानेवाले नेता चाहते हैं कि सब कुछ उनकी मर्जी से चले। वह विपक्ष को गाजर-मूली समझते हैं। उनकी नीति रहती है- माय वे या फिर हाईवे। मेरे बताए रास्ते पर चलो या फिर अपना रास्ता नापो! कहीं कोई समझौता या लचीलापन नहीं। इसीलिए संसद में भी कामकाज जाम होकर रह जाता है। इसका कोई इलाज नहीं है। विपक्ष के दिल से आवाज उठती है- जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां ।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा