निशानेबाज: मजबूत है अपनी डेमोक्रेसी फिर विपक्ष की उपेक्षा कैसी
Vande Matram: चाहे जैसी भी हो, अपनी डेमोक्रेसी पर हमें गर्व करना चाहिए। इसमें राजनीति का पेच है, पार्टियों की रस्साखींच है। ईवीएम का दम है और विपक्ष का गम है। सत्ता पक्ष का जोश है, असंतुष्टों का रोष।
- Written By: दीपिका पाल
मजबूत है अपनी डेमोक्रेसी फिर विपक्ष की उपेक्षा कैसी (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, चाहे जैसी भी हो, अपनी डेमोक्रेसी पर हमें गर्व करना चाहिए। इसमें राजनीति का पेच है, पार्टियों की रस्साखींच है। ईवीएम का दम है और विपक्ष का गम है। सत्ता पक्ष का जोश है, असंतुष्टों का रोष है। वादों की बारात है, मुफ्तखोरी वाली योजनाओं की खैरात है। सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ है फिर भी नेताओं के चेहरे पर ओज है.’ हमने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी पहले ही बता चुके हैं कि इंडिया इज मदर ऑफ डेमोक्रेसी।
बीजेपी के नेता भी कहते हैं- इस देश में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा। जिसके दिल में राष्ट्रभक्ति है, वह महंगाई, बेरोजगारी या गरीबी जैसे फालतू मुद्दों के बारे में नहीं सोचता विपक्ष व्यर्थ का डंका बजाता है। चुनाव आयोग पर शंका जताता है.’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता का पद खाली पड़ा है जबकि संविधान में इसका प्रावधान है। बिना नेता के विपक्ष की हालत सिरकटे जैसी है। विपक्ष का नेता आगे बढ़कर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को सीधी चुनौती देता है.’
हमने कहा, ‘बीजेपी के शासन में विपक्ष के नेता की वैसे भी कोई कद्र नहीं है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के लंच या डिनर में विपक्ष के नेता राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे को मोदी सरकार ने नहीं बुलाया। उनकी पूरी तरह उपेक्षा की। क्या लोकतंत्र में ऐसा होना चाहिए?’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, रूस में भी कौन सा विपक्ष का नेता है? चीन और रूस का शासन इसलिए मजबूत है क्योंकि वहां विपक्ष का नेता नामक कोई चुनौती नहीं है। अमेरिका में ट्रंप भी अपने विरोधियों की पूरी तरह अवहेलना करते हैं। मोदी को विपक्ष में सिर्फ शशि थरूर समझदार लगते हैं, इसलिए पुतिन को दिए गए भोज में उन्हें शामिल किया गया.’
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हमने कहा, ‘विपक्ष का आरोप है कि बंगाल चुनाव को देखते हुए मोदी सरकार ने वंदेमातरम पर दिनभर चर्चा चलाई और कहा कि जिन्ना के दबाव में आकर नेहरू ने वंदेमातरम को संक्षिप्त कर दिया। इसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक रहे डॉ। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने खुद मुस्लिम लीग से समझौता किया था तथा लालकृष्ण आडवाणी ने कराची जाकर जिन्ना की तारीफ की थी.’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, इसी तरह डेमोक्रेसी में नहले पर दहला जड़ा जाता है।’
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
