शीशे के बॉक्स में सोता इंसान (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, बंगलुरू में शीशे के बड़े बॉक्स वाले चलते वाहन में एक व्यक्ति को आरामदेह गद्दे-तकिया पर गहरी नींद लेते देखकर लोग विस्मय में पड़ गए. उन्हें ताज्जुब हुआ कि दिनदहाड़े भारी ट्रैफिक के बीच यह शख्स कैसे सो रहा है. फिर मालूम पड़ा कि यह फोम के गद्दे-तकिया (मैट्रेस व पिलो) बनानेवाली कंपनी की प्रचार मुहिम थी कि शोर-गुल भरे माहौल में भी उसके गद्दे-तकिया पर कितनी बढि़या नींद आती है।’
हमने कहा, ‘इस आपाधापी भरे माहौल में कितने ही लोगों की आंखों की नींद छिन गई है। 2000 के बाद जन्म लेनेवाली पीढ़ी जिसे कि जेन-जेड कहते हैं, बहुत कम सोती है, मोबाइल और लैपटॉप से उसे फुरसत ही नहीं मिलती। ऐसे ही घर-घर सामान पहुंचानेवाले गिग वर्कर भी बहुत कम होते हैं। भारत की 61 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो 7 घंटे से भी कम सो पाती है. कवि, साहित्यकार, पत्रकार, चौकीदार सभी रतजगा करते हैं. जिन्हें नींद नहीं आती वे गाते हैं- सो गया सारा जमाना, नींद क्यों आती नहीं! शिशु को लोरी गाकर सुलाया जा सकता है लेकिन बड़ों के लिए कोई उपाय नहीं है।धनवान लोग अपने बिजनेस की फिक्र में रात भर करवटें बदलते हैं, नींद की गोली भी उनपर बेअसर साबित होती है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, पहले लोग कड़ा शारीरिक परिश्रम करते थे इसलिए वे थकावट के कारण तुरंत सो जाते थे। किसानों और मजदूरों को इसीलिए अच्छी नींद आती है, कहते हैं- नींद ना जाने टूटी खाट, भूख ना जाने बासी भात! सोनेवाले को जगाया जा सकता है लेकिन सोने का ढोंग करनेवाले को नहीं जगाया जा सकता। रावण का भाई कुंभकर्ण 6 महीने तक गाढ़ी नींद में सोया रहता था। उसे कानों के पास ढोल-नगाड़े बजाकर बड़ी मुश्किल से जगाया जाता था।’
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हमने कहा, ‘आज भी जनता की मांगों और समस्याओं की ओर से मुंह फेरकर प्रशासन और नेता सो जाते हैं। जब चुनाव की बेला आती है तो हड़बड़ा कर नेता जाग जाते हैं वरना उनका रवैया ऐसा रहता है- किस-किस की फिक्र कीजिए, किस-किस को रोइये, आराम बड़ी चीज है, मुंह ढक के सोइए।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा